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Blogging Tips

Link Juice Kya Hai, SEO में कैसे काम करता है?

by Krishnaa October 5, 2025
written by Krishnaa

जब भी आप Seo और बैकलिंक की बात करते हैं, तो आपने कहीं ना कहीं लिंक जूस (Link Juice) का नाम जरूर सुना होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं, असल में ये लिंक जूस क्या है (Link Juice Kya Hai), और ये आपकी वेबसाइट को गूगल रैंकिंग में शामिल करने के लिए कैसे मदद कर सकता है। आइए जानते हैं:

लिंक जूस क्या है (Link Juice Kya Hai)

link juice kya hai

जब आपकी वेबसाइट को किसी अन्य दूसरी वेबसाइट से Do Follow Backlink मिलता है, तो उस बैकलिंक के द्वारा आपकी साइट को कुछ वैल्यू मिलती है।  वह वेबसाइट आपको अपनी कुछ रैंकिंग पावर, ऑथोरिट और ट्रस्ट देती है। Seo की भाषा में इस वैल्यू को लिंक जूस कहते हैं।

Link Juice कितने प्रकार के होते हैं

Link Juice दो प्रकार के होते हैं, इंटरनल लिंक जूस और एक्सटर्नल लिंक जूस।

1. Internal Link Juice 

अगर आप अपने किसी ब्लॉग आर्टिकल में अपने ही ब्लॉग के किसी दूसरे आर्टिकल की लिंक लगाते हैं, तो इसे Internal Link Juice कहते हैं। इंटरनल लिंकिंग करके ब्लॉग की वैल्यू बढ़ाई जा सकती है।

2. External Link Juice 

जब आपके ब्लॉग को किसी दूसरे ब्लॉग से लिंक मिलता है , तो उसे External Link Juice कहते हैं। External Linking से आप आपने ब्लॉग के DA की वैल्यू बढ़ा सकते है।

Link Juice बनाने के फायदे क्या हैं 

  • गूगल में अच्छी रैंकिंग हासिल कर सकते हैं।
  • ब्लॉग का DA बढ़ा सकते हैं।
  • पेज रैंकिंग में सुधार कर सकते हैं।
  • यूज़र एंगेजमेंट बना सकते हैं।
  • Seo में ब्लॉग को बेहतर बना सकते हैं।

Link Juice बनाने के नुकसान क्या हैं

लिंक जूस बनाने के कुछ नुकसान हैं:

  1. अननेचुरल और गलत तरीके से लिंक जूस बनाने से बचना चाहिए, क्युकी इससे गूगल सर्च में रैंकिंग हासिल करने में मुश्किलें आ सकती है।
  2. Poor Quality Link से ब्लॉग के ट्रेफिक में गिरावट आ सकती है। इसके लिए Poor Quality Link बनाने से बचना चाहिए।
  3. एक्सचेंज और खरीदे जानें वाले लिंक्स से बचना चाहिए, क्युकी इससे ब्लॉग के ट्रेफिक पर गलत असर पड़ सकता है।
  4. गूगल के एल्गोरिथम और अपडेट्स को ध्यान में रखकर लिंक्स बनाने हैं, नहीं तो ब्लॉग की रैंकिंग को खतरा हो सकता है।

Link Juice कैसे बनाते हैं

अब तक आप सभी जान गए होंगे, की लिंक जूस क्या है और इसके क्या फायदे हैं। अब आगे जानते हैं, की लिंक जूस कैसे बनाते हैं, इसके लिए इन पॉइंट्स को समझते हैं।

  1. Indirect Link Building 
  2. Direct Link Building 
  3. Internal Linking 

1. Indirect Link Building Seo

Indirect Link Building SEO की एक ऐसी स्ट्रेटजी होती है, जिसमें आपको किसी दूसरी वेबसाइट या ब्लॉगर से बैकलिंक मांगने की जरूरत नहीं होती है। बल्कि आप खुद ऐसा वैल्यूएबल कंटेंट बनाते हैं, जिससे दूसरे ब्लॉगर खुद से ही आपकी वेबसाइट या आर्टिकल को Do Follow Link प्रदान करने पर मजबूर हो जाएं। इसका सीधा मतलब यह होता है, की आप अपनी ब्रांड ऑथोरिटी, ट्रस्ट और ब्रांड इमेज के जरिए Naturally Backlink को अपनी तरफ खींचते हैं।

2. Direct Link Building Seo

Direct Link Building SEO की एक ऐसी स्ट्रेटजी है, जिसमें आपको खुद से आगे बढ़कर अन्य दूसरी वेबसाइट या ब्लॉगर से ईमेल भेजकर, लिंक एक्सचेंज करके, गेस्ट पोस्ट लिखकर या कॉन्टैक्ट करके अपने कन्टेंट के लिए बैकलिंक प्राप्त करने होते हैं। इसका सीधा मतलब आपकी वेबसाइट की ऑथोरिटी, रैंकिंग पावर और ऑर्गेनिक ट्रैफिक को बढ़ाने में मदद करना होता है।

3. Internal Linking Seo

Internal Link Building SEO जब आप अपने किसी ब्लॉग पोस्ट में अपने ही किसी अन्य दूसरे आर्टिकल का लिंक लगाते हैं, तो इस प्रक्रिया को ही Internal Linking Seo कहते हैं। इससे यूजर आपके रिलेटिड कंटेंट तक आसानी से पहुंचता है, इतना ही नहीं बल्कि गूगल को भी ये सिंगनल देता है, कि आपकी साइट पर कौन से पेजेस एक दूसरे के साथ कनेक्टिड हैं।

FAQs- Link Juice Kya Hai

1. लिंक वैल्यू क्या है- What Is Link Value In Seo

Seo में हर बैकलिंक बराबर नहीं होती हैं, किसी की वैल्यू ज्यादा होती है तो किसी की वैल्यू कम होती है। इसी को Seo में लिंक वैल्यू कहते हैं।

अगर कोई दूसरा ब्लॉगर आपके ब्लॉग के लिंक को अपने ब्लॉग के होमपेज, कैटेगरी पेज, या आर्टिकल की शुरुआत में सबसे पहले लगाता है, तो उसकी वैल्यू सबसे ज्यादा होती है।

क्योंकि वहां से मिले लिंक की ऑथोरिटी को गूगल महत्वपूर्ण समझता है। लेकिन अगर कोई अपने ब्लॉग आर्टिकल के अंत में आपको लिंक देता है, तो उसकी वैल्यू सबसे कम होती है। 

2. Link Juice SEO में कैसे काम करता है?

जब कोई अच्छी ऑथोरिटी वाली वेबसाइट या ब्लॉग आपके पेज को बैकलिंक प्रदान करते है, तो वह आपको अपनी कुछ रैंकिंग पावर और ऑथोरिटी वैल्यू ट्रांसफर कर रहे हैं। इसको Seo में Link Juice Flow कहते हैं।

3. क्या हर backlink Link Juice पास करता है?

नहीं, केवल Do Follow Backlink ही लिंक जूस देते है, जबकि No Follow Backlinks केवल रेफरल ट्रैफिक देने का काम करते हैं।

4. Link Juice बढ़ाने के सबसे अच्छे तरीके क्या हैं?

ज्यादा डोमेन ऑथोरिटी वाली साइट्स से बैकलिंक प्राप्त करना फायदेमंद होता है। इसके अलावा गेस्ट पोस्टिंग एक अच्छा तरीका है, बैकलिंक प्राप्त करने के लिए। लेकिन Irrelevant Sites से लिंक लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे ब्लॉग ऑथोरिटी को नुकसान पहुंच सकता है।

5. क्या Anchor Text का लिंक जूस पर असर होता है?

हां बिल्कुल, एंकर टेक्स्ट का लिंक जूस पर प्रभाव पड़ता है। क्योंकि ये गूगल को बताता है, की आपके कौन से लिंक किस टॉपिक के साथ कनेक्ट हैं, जिससे Seo Value बढ़ती है।

6. क्या Link Value समय के साथ घटती है?

हां बिल्कुल, अगर लिंक किसी काम की नहीं रहती, इनएक्टिव हो जाती है या किसी भी कारण लिंक किए हुए पेज की ऑथोरिटी घट जाती है, तो उसकी वैल्यू कम हो जाती है।

7. क्या लिंक जूस केवल SEO के लिए ही जरूरी है?

ऐसा नहीं है, लिंक जूस केवल Seo तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आपकी वेबसाइट की क्रेडिबिलिटी (Credibility), ब्रांड ट्रस्ट, और रेफरल ट्रैफिक को बढ़ाने में भी आपकी मदद करता है।

निष्कर्ष- Link juice Kya Hai

Seo में लिंक जूस और लिंक वैल्यू ये दोनों ही वेबसाइट की अच्छी रैंकिंग के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर आप रेलेवेंट वेबसाइट से High Quality Backlinks प्राप्त करते हैं, तो आपकी वेबसाइट को गूगल में अच्छी ऑथोरिटी और ट्रस्ट मिलता है।

मैं आशा करता हूं, कि आपको आज का यह आर्टिकल पसन्द आया होगा और इसकी मदद से आप अपने ब्लॉग के लिए ज्यादा से ज्यादा लिंक जूस बना सकते हैं। आपको यह आर्टिकल कैसा लगा कॉमेंट में जरूर बताएं। आपका कोई सवाल है, तो आप वह भी पूछ सकते हैं। धन्यवाद, राधे राधे।

October 5, 2025 0 comments
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Competitor Analysis Kaise Kare
Blogging Tips

Competitor Analysis Kaise Kare-2024 (10 Best Tips)

by Krishnaa February 28, 2024
written by Krishnaa

Competitor Analysis Kaise Kare– क्या होगा, अगर आपको एक ऐसा तरीका पता लग जाए, जिसमें आप अपने ब्लॉग के Competitor के बारे में सब कुछ जान सकते हैं। कितना आसान हो जायेगा ना, ब्लॉगिंग करना। इससे समय की भी काफी बचत होगी, जिसके चलते आप अपने ब्लॉग के लिए नए-नए टारगेट कीवर्ड पर Unique Content लिख पाएंगे।

Competitor Analysis Kaise Kare

आपने कही से Competitor Analysis के बारे में जरूर सुना और पढ़ा होगा। लेकिन ज्यादातर वह ब्लॉगर्स, जो ब्लॉगिंग के क्षेत्र में अभी नए है, उन्हें कंपीटीटर एनालाइज के बारे में ज्यादा नॉलेज नहीं है।

जिसकी वजह से वह अपने प्रतियोगी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जान पाते हैं। लेकिन आज का यह पूरा आर्टिकल Competitor Analysis करने के बारे में है। जिसमे आप ये कुछ जरूरी पॉइंट्स को जानेंगे।

  • What is Competitor Analysis 
  • Competitor Analysis कैसे करें
  • What Is The Method Of Competitor Analysis
  • What Tool Is Used For Competitor Analysis

Competitor Analysis क्या है

ब्लॉग टॉपिक से रिलेटिड कीवर्ड को गूगल में सर्च करने पर जितने भी ब्लॉग पोस्ट दिखाई देती है, वही आपके कंपटीटर होते है। उन्हीं कंपीटीटर के बारे में जरूरी जानकारी को ढूंढना और उसपर रिसर्च करना, उसे Competitor Analysis कहते हैं। 

विस्तार से समझाता हूं, जब आप गूगल में अपना एक कीवर्ड लिखकर सर्च करते है, रिजल्ट में आपके सर्च किए कीवर्ड के अनुसार ब्लॉग पोस्ट दिखाई देती है। अगर आप उन ब्लॉग के DA, PA, Backlink, Keyword के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो इसे ही Competitor Analysis कहते हैं।

Competitor Analysis करने के फायदे

Competitor Analysis करने से आपके ब्लॉग को कुछ फायदे हो सकते हैं, जो इस प्रकार हैं।

  • ब्लॉग की रैंकिंग में सुधार कर सकते हैं।
  • अपने ब्लॉग के लिए यूनिक कंटेंट आइडिया ढूंढ सकते हैं।
  • ब्लॉग का Seo करने में मदद मिलती है।
  • Keywords Research करने में सहायता मिलती है।
  • ब्लॉग के ट्रेफिक को बढ़ाने में मदद मिलती है।
  • यूज़र के सर्च इंटेंट को समझ सकते हैं।

Competitor Analysis क्यों महत्वपूर्ण है

Competitor को अच्छे से एनालाइज करने के बाद आप अपने कंपटीटर की स्ट्रेटजी के बारे में जान सकते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह भी है, की आप अपने ब्लॉग की कमियों को सुधार सकते हैं। इसके अलावा ब्लॉग को गूगल सर्च इंजन के लिए ऑप्टिमाइज भी कर सकते हैं।

Competitor Analysis कैसे करें 

कंपीटीटर एनालाइज करने से कंपीटीटर के काम करने के तरीके के बारे में जान सकते हैं, कि वह कैसे काम करते हैं। इसके माध्यम से हम अपने ब्लॉग कंपटीटर की स्ट्रेटजी को समझ सकते हैं और अपने ब्लॉग को बेहतर बनाकर आगे बढ़ सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ जरूरी बातों को ध्यान में रखना चाहिए।

1. Content की Quality पर ध्यान दें

अपने Competitor Blog के कॉन्टेंट को देखें और समझें कि उसमें ऐसा क्या लिखा गया है, जो आपके ब्लॉग में सुधार जा सकता है। कंटेंट की क्वॉलिटी बढ़ाने के लिए कंपटीटर के ब्लॉग से ज्यादा जानकारी भरा कंटेंट लिखने पर ध्यान देने की कोशिश करते रहें। आपके ब्लॉग पर जितना ज्यादा अच्छा इनफॉर्मेटिव कंटेंट पोस्ट होगा, उतना ही कंटेंट की क्वॉलिटी सुधरती जायेगी।

2. On Page Seo पर ध्यान दें

कंपटीटर ब्लॉग के On Page Seo को ज़रूर चैक कर लें, क्युकी Good Backlinks बनाना और क्वॉलिटी कंटेंट लिखने ही काफी नहीं है। जबतक ब्लॉग का On Page Seo ठीक से नहीं हुआ हो, तब तक क्वॉलिटी कंटेंट लिखने से ज्यादा कुछ नहीं होगा। इसलिए अपने ब्लॉग का On Page Seo में सुधार करें।

3. Good Backlink पर ध्यान दें

बैकलिंक Seo का ही एक हिस्सा होता है, जिससे ब्लॉग को गूगल में रैंक करने में सहायता मिलती है। Competitor Analysis करते समय उनके बैकलिंक पर जरूर ध्यान रखना जरूरी है। क्युकी इससे आपको उनके बैकलिंक सोर्स और बैकलिंक क्वांटिटी के बारे में जानकारी निकाल सकते हैं।

उनके बैकलिंक क्वांटिटी से ज्यादा क्वांटिटी आपके ब्लॉग पर होनी चाहिए। क्योंकि ज्यादा बैकलिंक आपके ब्लॉग को गूगल में रैंक कराने में मदद करती है।

4. Blog Traffic पर ध्यान दें

अपने Competitor Blog के Traffic यानी उसकी ऑडिएंस के बारे जानकारी प्राप्त करें। जब आप यह जान लेते हैं, तो अपने ब्लॉग पर ट्रेफिक ला सकते हैं।

5. Domain Authority पर ध्यान दें

Competitor ब्लॉग के DA यानी उसकी Domain Authority को चेक कर लेना चाहिए। क्योंकि यह Seo का एक जरूरी हिस्सा होता है, Search Engine Result Page में ब्लॉग की परफॉरमेंस और उसकी रैंकिंग के बारे में जानकारी मिलती है। 

Competitor ब्लॉग के DA चेक करने के लिए इन पॉइंट्स पर ध्यान दें। 

  • कंपटीटर ब्लॉग का DA कम या ज्यादा है।
  • अपने ब्लॉग के DA को कंपटीटर ब्लॉग के DA से ज्यादा करने कि कोशिश करनी होगी।
  • अपने ब्लॉग के DA को बढ़ाने के लिए एक बेहतर स्ट्रेटजी बनानी होगी।

Competitor के DA कैसे चेक करें

कंपीटीटर के ब्लॉग की डोमेन अथॉरिटी चेक करने के लिए Moz, Semrush, Ahrefs और Website Seo Checker जेसे इन सभी टूल का इस्तेमाल कर सकते हैं।

Competitor को पीछे कैसे छोड़ें 

  • कंपटीटर के कॉन्टेंट को ध्यान में रखकर अपने ब्लॉग पर उससे ज्यादा इनफॉर्मेटिव कंटेंट लिखें।
  • Good और हाई क्वालिटी की बैकलिंक बनाएं।
  • अपने ब्लॉग में इंटरनल लिंकिंग पर ध्यान देना शुरू करें।
  • अपने सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म पर डेली एक्टिव रहने की कोशिश करें।
  • ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा Seo Friendly Article लिखने की कोशिश करें।
  • ब्लॉग के On Page और Off Page Seo पर ध्यान देने की कोशिश करें।
यहां ध्यान दें- DA (Domain Authority) केवल Moz की एक मैट्रिक है, जो रेंकिंग का फैक्टर नहीं है। ब्लॉग का DA बढ़ाने के लिए काफी समय भी लग सकता है, इसलिए धैर्य रखकर लगातार Seo Friendly कंटेंट लिखने पर ध्यान देने की कोशिश करते रहें।

6. Domain Age पर ध्यान दें

Domain Age जो कि रैंकिंग का एक जरूरी हिस्सा होता है। Domain Age जितनी ज्यादा होती है, कहने का मतलब डोमेन जितना पुराना होगा, उतना ही गूगल का आपके ब्लॉग के प्रति विश्वास बनेगा। 

इसलिए अपने कंपटीटर ब्लॉग के Domain Age को ज़रूर चैक कर लें, और अपने ब्लॉग का Domain Age बढ़ने तक का इंतजार करें।

7. Keywords पर ध्यान दें

अपने कंपटीटर ब्लॉग को चैक करते समय उनके कीवर्ड को देखें, की वह किन-किन कीवर्ड पर लेख लिख रहे हैं। उनके कीवर्ड को अपनी नोटबुक में लिख लें और उन कीवर्ड्स पर इनफॉर्मेटिव क्वालिटी कंटेंट लिखने की कोशिश करते रहें।

8. Keywords Density पर ध्यान दें

इसके बाद यह चेक कर लें, की कंपीटीटर अपने ब्लॉग पोस्ट में एक कीवर्ड को कितनी बार और कहां इस्तेमाल कर रहा है। अगर आप यह जान जाते हैं, तो आपको अपने ब्लॉग पोस्ट में Keyword Density सुधार करने में सहायता मिलेगी।

9. Content की Quantity पर ध्यान दें

कंपटीटर के ब्लॉग पर कितनी ब्लॉग पोस्ट की गई है, इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। अगर आपके ब्लॉग पर कंपटीटर के मुकाबले ब्लॉग पोस्ट की क्वांटिटी कम है तो Content की Quantity बढ़ाने की कोशिश करें।

10. Pages पर ध्यान दें 

कंपटीटर के ब्लॉग में उनके Page’s को भी जरूर चेक करना चाहिए, की उनके ब्लॉग पर कोन कोन से जरूरी Page को लगाया गया है। अगर आपके ब्लॉग पर जरूरी Page’s नहीं है, तो उन सभी को अपने ब्लॉग में जरूर शामिल कर लें। 

निष्कर्ष- Competitor Analysis Kaise Kare

Competitor Analysis Kaise Kare और Competitor Analysis करना क्यों महत्वपूर्ण है। आज के लेख में कुछ ऐसे ही जरूरी प्वाइंट को कवर किया है, जिससे आपको अपने ब्लॉग के कंपीटीटर को एनालाइज करने में सहायता मिलेगी।

आशा करता हूं, कि आपको आज का लेख पसंद आया होगा। कॉमेंट में अवश्य बताएं, धन्यवाद राधे राधे।

February 28, 2024 0 comments
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Micro Niche Blog Kya Hai
Blogging Tips

Micro Niche Blog Kya Hai: Micro Niche ब्लॉग कैसे बनायें 2024

by Krishnaa February 6, 2024
written by Krishnaa

Micro Niche Blog Kya Hai– अगर आप पहले से ही Pro Blogging करते हैं, तो आपको अच्छे से Micro Niche के बारे में जानकारी होगी। लेकिन ज्यादातर जो लोग अभी ब्लॉगिंग में नए हैं, या अपना ब्लॉग बनाना चाहते हैं, उनको Micro Niche के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं होती है। 

Micro Niche Blog Kya Hai

जिससे वह गलत टॉपिक पर ब्लॉग लिखना शुरू कर देते हैं, ज्यादातर इसका परिणाम गलत निकलता है। क्योंकि गलत टॉपिक को चुनने से नए ब्लॉगर्स को अंत में असफलता मिलती है।

इसलिए आपको एक ऐसा Blogging Niche या टॉपिक चुनना चाहिए, जिसका कंपीटीशन कम हो और उस विषय पर आपकी जानकारी अधिक हो। आज मैने इस लेख में कुछ ऐसे सवालों को जोड़ा है, जो नए ब्लॉगर्स के मन में आते होंगे। लेख में शामिल हैं-

  • Micro Niche क्या है
  • Micro Niche के फायदे क्या हैं 
  • Micro Niche Blog कैसे बनाते हैं
  • Micro Niche Topic ढूंढने के तरीके
  • और भी बहुत कुछ 

Micro Niche Meaning in Hindi

Micro यानी सुक्ष्म और Niche का मतलब एक विषय या केटेगरी, इसे हिंदी में सूक्ष्म विषय कहते हैं। 

Micro Niche Blog क्या होता है 

Micro Niche एक ऐसी Blogging Niche होती है, जिसमें ब्लॉग किसी छोटे विषय बनाया गया होता है। उदाहरण देकर समझाने का प्रयास करता हूं, कि आप हेल्थ केटेगरी पर ब्लॉग बनाते हैं, तो यह एक Niche Blog है। इसके Micro Niche कुछ इस तरह से होंगे। 

  • Weight Loss
  • Diet
  • Mental Health 

Micro Niche क्यों जरूरी है 

समझने के लिए अगर आपने एक ऐसे छोटे विषय पर अपना ब्लॉग बनाया है। जिसमे आपको कम मेहनत करने को मिलती है, और इन ब्लॉग पर कम कंपीटीशन होता है। लेकिन ऐसे ब्लॉग पर कम ट्रेफिक देखने को मिलता है। 

अगर आप इस ब्लॉग पर लगातार मेहनत करते है, क्योंकि कम कंपीटीशन होने की वजह से ब्लॉग पर Hot Traffic यानी (Same Traffic) मिलने की संभावना बन जाती है। एक सही Micro Niche Topics चुनने से ये कुछ फायदे हो सकते हैं। 

  • ब्लॉग बनाने से लेकर ब्लॉग अपडेट कम समय में कर सकते हैं, जिसमें आपको कम मेहनत करनी होती है।
  • एक ऐसा टॉपिक जिसका विषय छोटा और जानकारी भरा है, उसे गूगल में जल्दी रैंकिंग मिल सकती है।
  • ब्लॉग के प्रति ब्लॉग रीडर्स का विश्वास बनाने में मदद मिलती है।
  • इसलिए ऐसे विषय सिलेक्ट करना चाहिए, जिसकी डिमांड ज्यादा है और उसकी सप्लाई कम है।

Micro Niche Blog कैसे बनाते हैं

Micro Niche Blog बनाने के लिए आपको ये कुछ चीजें करनी होंगी:

#1. Niche का चयन करें 

अगर आपने Micro Niche Blog बनाने के बारे में सोच ही लिया है तो इसके लिए सबसे पहले एक सही Niche या केटेगरी को चुनना चाहिए। एक ऐसा Niche को चुनें, जिसमे आपकी जानकारी अधिक हो और आपकी ऑडियंस को पसंद आए।

क्योंकि Micro Niche Blog को गूगल में रैंक करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होती है। इसलिए ब्लॉग बनाने से पहले एक बेहतर Niche को चुनना चाहिए। इसके लिए Keyword Research कर सकते हैं।

#2. Keyword Research करें 

Micro Niche Blog बनाने के लिए कीवर्ड रिसर्च करना बहुत जरूरी होता हैं। Niche को चुनने के बाद अपने ब्लॉग से रिलेटिड 100 कम डिफिकल्टी वाले कीवर्ड को ढूंढकर किसी नोटपैड में Save कर लेना है।

#3. Domain Name का चयन करें 

Blog Niche से रिलेटिड एक Domain Name का चुनाव करना है। दूसरे शब्दों में कहूं, तो एक फोकस कीवर्ड को ध्यान में रखकर Blog Niche से मिलता-जुलता एक Domain Name सिलेक्ट करना है। 

उदाहरण देकर समझाता हूं, अगर आप Diet पर एक माइक्रो नीच ब्लॉग बनाना चाहते हैं। तो Diethindi.com डोमेन को चुन सकते हैं। क्योंकि इसमें Diet नाम का एक कीवर्ड है, जो आपके Micro Niche को Focus करता है।

#4. Blogging Platform का चयन करें

Niche और Domain Name सिलेक्ट करने के बाद अब Best Blogging Platform की जरूरत होगी। जिसमें ब्लॉग पोस्ट से लेकर और भी कई जरूरी सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए। 

अब आपके मन में कुछ ऐसा सावल आ रहा होगा, जैसे Best Blogging Platform कौन से हैं? मेरे अनुभव के अनुसार वर्डप्रेस, Micro Niche Blog के सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म है।

क्योंकि WordPress में बहुत सारे Plugin और Lightweight Theme का सुपोर्ट मिल जाता है, जिससे ब्लॉग का Seo सुधारने में सहायता मिलती है। 

#5. Hosting Service का चयन करें 

Domain और ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म को चुनने के बाद एक अच्छी और फास्ट वेब होस्टिंग को सिलेक्ट करें। इसके बाद अपने Domain को वेब होस्टिंग के साथ कनेक्ट करना है। आपको एक ऐसी वेब होस्टिंग का चुनाव करना चाहिए, जिससे ब्लॉग बिना रुकावट के जल्दी लोड हो सके। 

#6. Theme का चयन करें 

ब्लॉग सेटअप के बाद अब बात आती है, ब्लॉग के डिजाइन की, उसके लिए एक ऐसी Theme को सिलेक्ट करना है। जिसमें Core Web Vitals और फास्ट लोडिंग जैसे सभी फंक्शन मौजूद हों। एक अच्छी Theme का इस्तेमाल करने से ब्लॉग के Mobile Usability को ठीक रख सकते हैं।

#7. Seo Friendly ब्लॉग पोस्ट लिखें

ब्लॉग डिज़ाइन करने के बाद अपने Micro Niche Blog को ध्यान में रखते हुए, Seo Friendly Article लिखने चाहिए। एक निश्चित समय पर ब्लॉग आर्टिकल को पोस्ट करें, इसके लिए आप एक शेड्यूल बना सकते हैं। गूगल में अच्छी रैंकिंग पाने के लिए ब्लॉग के Seo पर विशेष ध्यान रखना जरूरी है।

#8. Webmaster Tool में ब्लॉग को सबमिट करें 

ब्लॉग लिखने के बाद बात करते हैं, ब्लॉग गूगल सर्च में कैसे दिखाई देगा? ब्लॉग को गूगल सर्च में दिखाने के लिए अपने ब्लॉग को गूगल सर्च कंसोल में सबमिट करना है। इसके बाद आप अपने ब्लॉग के सभी पेज और पोस्ट को गूगल में इंडेक्स कर पायेंगे। 

#9. Pro Blogging Tips हिंदी में 

ब्लॉग को गूगल में दिखाने के लिए बहुत सारे जरूरी फैक्टर होते हैं। ब्लॉग को अच्छी रैंकिंग देने के लिए ब्लॉग के Seo यानी On Page Seo और Off Page Seo की अहम भूमिका होती है। इसलिए ब्लॉग के Seo को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।

ब्लॉग को सफल बनाने के लिए इन Pro Blogging Tips के बारे में समझें।

  • ब्लॉग पोस्ट को अपडेट करते रहें।
  • ब्लॉग के आर्टिकल को दूसरे मुख्य ब्लॉग के साथ लिंकिंग के माध्यम से कनेक्ट करें।
  • ब्लॉग को मोबाइल फ्रेंडली बनाने पर ध्यान रहें।
  • ब्लॉग पोस्ट में लोगो के कॉमेंट का जवाब देते रहें।

Micro Niche ढूंढने के 5 आसान तरीके

Micro Niche ब्लॉग बनाने से पहले आपको एक ऐसी Niche का सिलेक्शन करना होगा, जिसमे आपकी रुचि हो। ये पांच तरीके आपका Micro Niche ढूंढने में आपकी सहायता कर सकते हैं।

  • अपने इंटरेस्ट के आधार पर ब्लॉग नीच का सिलेक्शन करें।
  • टारगेट ऑडियंस को ध्यान में रखकर नीच का सिलेक्शन करें।
  • सोशल मीडिया के माध्यम से ब्लॉग नीच के बारे में जानकारी प्राप्त करें।
  • अपने कंपटीटर को एनालाइज करके ब्लॉग नीच का सिलेक्शन करें।

10 Micro Niche Topic List 

  1. Technology Micro Niche
  2. Travel Micro Niche
  3. Fashion Micro Niche
  4. Personal Finance Micro Niche
  5. Food Micro Niche
  6. Education Micro Niche
  7. Health and Wellness Micro Niche
  8. Lifestyle Micro Niche
  9. Beauty Micro Niche
  10. Gaming Micro Niche

निष्कर्ष- Micro Niche Blog Kya Hai

आज मैने इस लेख में आसान शब्दों में बताया है, कि Micro Niche Blog Kya Hai और Micro Niche Blog कैसे बनाते हैं। इसके अलावा इसमें ये कुछ जरूरी जानकारी भी शामिल हैं, जैसे- How To Select Niche For Blogging, Micro Niche Ideas 2024, Micro Niche क्यों जरूरी है,Micro Niche ब्लॉग कैसे बनायें आदि।

I Hope, आपको आज का आर्टिकल Micro Niche Blog Kya Hai पसंद आया होगा। कमेंट करके जरूर बताएं, आपका, धन्यवाद राधे राधे।

February 6, 2024 0 comments
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google trends kya hai
Blogging Tips

Google Trends kya Hai: नए ब्लॉगर के लिए Best 5 सीक्रेट टिप्स

by Krishnaa February 1, 2024
written by Krishnaa

Google Trends Kya Hai– क्या आप डिजिटल मार्केटिंग में एक Beginner हैं? अगर आप ब्लॉग्गिंग, युटुबर या किसी भी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की दुनिया में नए हैं, तो आपके मन में भी कुछ ऐसे सवाल जरुर आते होंगे। जैसे- Google Trend Kya Hai, 2024 में सबसे ज्यादा क्या सर्च हो रहा है? कौन सा टॉपिक ट्रेंडिंग हैं?

Google Trend Kya Hai

इसके अलावा नए ब्लॉगर को Micro Niche Topic और रोज नए-नए टॉपिक ढूंढने में समस्या आती है। जिसमे उनका काफी सारा समय खराब हो जाता है। एक Beginner के लिए यह सभी काम काफी मुश्किल हो जाते है, अब सवाल यह उठता है, कि आपको कैसे पता चल सकता है, कि गूगल पर क्या ट्रेंड कर रहा है और क्या नहीं?

अरे दोस्तों टेंशन क्यूँ लेते हो। अब आप Techaasvik Blog पर आए हो, तो कुछ सीखकर ही जाओगे। जी हाँ दोस्तों, अगर आप इन सभी सवालों के जवाब चाहते हैं, तो Google Trends इन सभी कामों में माहिर है। 

गूगल के इस टूल को, जादुई टूल कहना गलत नहीं होगा। क्योंकि यह ऐसे ट्रेंडिंग टॉपिक और कीवर्ड खोजने में आपकी मदद करता है, जिससे आपके कंटेंट को ट्रेंड के साथ जोड़ने में मदद मिलती है। आज का लेख Google Trend Kya Hai और Google Trends Beginner Guide Hindi पर है। लेख में यह पॉइंट्स भी शामिल हैं।

  • Google Trends को कैसे इस्तेमाल करें हिंदी में
  • किसी भी टॉपिक के ट्रेंड को ट्रैक करें और समझें
  • गूगल ट्रेंड्स कैसे काम करता है    
  • गूगल ट्रेंड्स से कीवर्ड रिसर्च कैसे करें 

Trends क्या होता है

वर्तमान समय में अगर किसी कीवर्ड या किसी घटना को लोगों द्वारा सबसे अधिक बार सर्च किया जा रहा है, तो उसे Trend कहते हैं। उदाहरण के तौर पर कहूं, तो जब किसी भी टॉपिक को अधिक से अधिक समय तक सर्च किया जाता है, तो वह Trending Topic कहलाता है।

Google Trends क्या है- (Google Trends Kya Hai)

Google Trends एक ऑनलाइन टूल है। इस टूल की मदद से आसानी से लोगों द्वारा खोजे जा रही चीजों का पता लगा सकते हैं। कोई व्यक्ति इन्टरनेट पर क्या कीवर्ड लिखकर सर्च कर रहा है, इसकी मदद से Trending Blog Niche और Keywords ढूंड सकते हैं।

दूसरे शब्दों में समझाता हूं, गूगल पर आज क्या ट्रेंड कर रहा है, लोग किस कीवर्ड को गूगल में ज्यादा सर्च कर रहें हैं। इस बात का पता गूगल ट्रेंड का यूज करके आसानी से कर सकते हैं। यह टूल कीवर्ड के पिछले रिकॉर्ड के अनुसार एक ग्राफ दिखाता है, जिसकी मदद से कीवर्ड के ट्रेंड का आसानी से पता लगाया जा सकता है।  

Google Trends की कब शुरुआत हुई

6 अगस्त, साल 2008 में इसकी शुरूआत हुई थी। गूगल द्वारा उस समय  Google Trends को Google Insights for Search के नाम से लॉन्च किया गया था। इसके बाद में 27 दिसंबर साल 2012 को गूगल ने इसका नाम Google Insights for Search से बदलकर Google Trends रख दिया। आप इसके माध्यम से अपने ब्लॉग पोस्ट के लिए आसानी से कीवर्ड रिसर्च कर सकते हैं।

Google Trends के फायदे

Google Trends के फायदे, कुछ इस प्रकार हैं- 

1. Top Trending Niches ढूँढना

इसकी मदद से टॉप ट्रेंडिंग Niche को ढूंड सकते हैं और Niche को अलग-अलग केटेगरी, भाषा, कंट्री और टाइम के हिसाब से भी ढूंढ सकते हैं। आप अपने किसी एक Particular Region का डाटा भी यहाँ देख सकते हैं।

2. Niche Trend

जिस भी Niche Idea पर आप रिसर्च कर रहे हैं। वह सर्च इंजन में कितना ट्रेंड कर रहा है या उसका ट्रेंड खत्म हो चूका है। इसे आप ग्राफ के माध्यम से देख सकते हैं।  

3. Time और Data Graph

आप डाटा को महीने और साल के अनुसार भी चेक कर सकते हैं। इससे आप Niche या कीवर्ड के पिछले डाटा और वर्तमान डाटा को Compare कर सकते हैं।  

4. भाषा

आप अपनी भाषा अनुसार ट्रेंडिंग टॉपिक या कीवर्ड को ढूंड सकते हैं। आप जिस भाषा में भी Keyword Research करना चाहते हैं। उस भाषा में लिखकर सर्च कर सकते हैं, और आपको उसी भाषा के अनुसार डाटा मिल जाता है। 

5. Content Strategy

आप इस टूल की मदद से अपनी ब्लॉग वेबसाइट के लिए एक कंटेंट Strategy भी बना सकते हैं 

Blogger के लिए Google Trends के फायदे

आप एक ब्लॉगर है, तो गूगल ट्रेंड्स का इस्तेमाल करके होने वाले फायदे के बारे में समझें।

  • अपने ब्लॉग पर क्वालिटी कंटेंट बनाने के लिए ट्रेंडिंग कीवर्ड को ढूंढ रहे हैं।
  • Trending Topic को ढूंढकर, उसपर बहुत अच्छा Seo Friendly Article लिख सकते हैं।
  • किसी भी देश के Trending Keyword के बारे में जानकारी निकाल सकते हैं।
  • Trending Topic पर ब्लॉग लिखने से अपने ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा ऑडियंस को आकर्षित कर सकते हैं।
  • Content idea on any topic

Youtuber’s के लिए Google Trends के फायदे

यूट्यूबर्स के लिए Google Trends के कई फायदे हैं।

  • यूट्यूब वीडियो बनाने के लिए ट्रेंडिंग कीवर्ड और टॉपिक ढूंढ सकते हैं।
  • वर्तमान में लोगों द्वारा पसंद किए जार हे विषयों के बारे में जानकारी ले सकते हैं 
  • वर्तमान ट्रेंड् की पहचान कर सकते हैं।
  • अपनी ऑडियंस की रुचि या Query पहचान सकते हैं और उन पर काम कर सकते हैं।
  • अपने Competitors की गतिविधियों को ट्रैक करके अपने कंटेंट में सुधार कर सकते हैं।
  • अपने पुराने कंटेंट को बेहतर करने के लिए कीवर्ड ढूंड सकते हैं।
  • Content idea on any topic

Google Trends पर अकाउंट कैसे बनाएं

गूगल ट्रेंड का अकाउंट बनाने के लिए इन तीन स्टेप्स को फ़ॉलो करें।

  • गूगल में Google Trends लिखकर सर्च करें।
  • इसके बाद इसकी वेबसाइट को ओपन करें।
  • अपने जीमेल आईडी से साइन इन करें।
  • Google Trends पर अकाउंट बनाने के बाद इसका इस्तेमाल करें।

Google Trends का इंटरफ़ेस समझें: Beginner guide 2024

गूगल ट्रेंड के हर एक प्वाइंट को समझ पाना थोड़ा कठिन काम है। लेकिन मैं आपको गूगल ट्रेंड के इंटरफेस को तीन हिस्सों में बाँट कर समझाने का प्रयास करता हूं। जैसे: मेनू, फ़िल्टर और परिणाम।

1. Menu को समझते हैं:

गूगल ट्रेंड में किसी कीवर्ड के वर्तमान ट्रेंड का पता कर सकते है, तीन तरीकों से ट्रेंड का पता कर सकते हैं। 

#1. Explore: 

आप Explore सेक्शन में कोई भी कीवर्ड डाल कर सर्च कर सकते हैं  

#2. Trending Now:

इस सेक्शन में Trending Searches देखने को मिल जाती हैं 

#3. Search Bar:

जब हम Explore सेक्शन में जाते हैं तो वहां उपर की तरफ Keyword Research के लिए एक सर्च बॉक्स होता है

2. Filters को समझते हैं: 

गूगल ट्रेंड में किसी भी कीवर्ड को फिल्टर करके उसके डाटा को एनालाइज कर सकते हैं। फिल्टर को छः पॉइंट्स में समझते हैं।

#1. Timeframe: 

इस फ़िल्टर से आप घंटे, महीने या साल किसी को भी चुनकर कीवर्ड के लिए परिणाम देख सकते हैं आप टाइम के हिसाब से किसी भी कीवर्ड के डाटा को Analyse कर सकते हैं।

उदाहरण:- अगर हम “Google Search Console” keyword सर्च करते हैं और Timeframe में बारी-बारी से 3 महीने, 6 महीने और 12 महीने सेलेक्ट करके ट्रेंड ग्राफ चेक करेंगे। ऐसा करने से हमें अलग-अलग टाइम में ट्रेंड का पता चल जायेगा, कि यह कीवर्ड कब कितना ट्रेंड में रहा है। 

#2. Location: 

आप अलग-अलग देश (Country) सिलेक्ट का फ़िल्टर लगा कर कीवर्ड का डाटा चेक कर सकते हैं ।

उदाहरण:- भारत, पाकिस्तान, जापान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, अमेरिका आदि। 

#3. Subregion और City:

आप कोई कंट्री सेलेक्ट करने के बाद उस कंट्री के Subregion और सिटी के लिए भी परिणाम चेक कर सकते हैं। आप लोकल सिटी को भी टारगेट कर सकते है और अपने ब्लॉग के SEO को बेहतर कर सकते हैं।   

उदाहरण:- अगर हम कंट्री भारत चुनते हैं, तो उसके बाद Subregion में किसी भी सिटी को चुन सकते हैं जैसे मुंबई, हरियाणा, उत्तरप्रदेश आदि।

#4. Category:

आप अपने Niche के अनुसार केटेगरी फ़िल्टर लगा सकते हैं या सभी केटेगरी के परिणाम चेक कर सकते हैं आप केटेगरी पर जाकर सभी केटेगरी को देख पाएंगे।

उदाहरण:- जैसे हम “Internet And Telecom” केटेगरी को चुन लेते हैं, तो हमें इसी केटेगरी के परिणाम मिलने शुरू हो जायेंगे जैसे आप नीचे देख पा रहे हैं। Related Topics में Quora, WordPress और Keyword Research के टॉपिक दिखयी दे रहे हैं।

#5. Compare:

इस फ़िल्टर की मदद से आप किन्ही दो कीवर्ड या टॉपिक की तुलना कर सकते हैं। इससे दोनों कीवर्ड या टॉपिक के ट्रेंड की तुलना हो सकती है।  

#6. Web search:

इसमें चार ऑप्शन देखने को मिल जाते हैं, जैसे: Image Search, News Search, Youtube Search और Google Shopping आदि। आपको जिस भी प्रकार का कीवर्ड चाहिए उसी जरूरत अनुसार इनमे से एक चुन लें।  

3. Result को समझते हैं:

#1. Interest Over time Graph:

इसमें हम कीवर्ड के पिछले रिकॉर्ड और वर्तमान रिकॉर्ड का ग्राफ देख सकते हैं, कि किस कीवर्ड का ग्राफ का Peak उपर या नीचे कहाँ जा रहा है। इससे ट्रेंड का पता लगाया जा सकता है।

#2. Related Topics: 

इसमें ट्रेंडिंग टॉपिक्स दिखाए जाते हैं। 

#3. Related Queries:

इसमें ट्रेंडिंग यूजर Query दिखाई जाती हैं। 

#4. Export:

सभी कीवर्ड को Google sheet की CSV फाइल या एक्सेल फाइल में save करने का ऑप्शन मिल जाता है।

Google Trends इंटरफ़ेस: सबसे जरूरी बातें

Related Topic और Related Queries में हमें कुछ सिंबल और ऑप्शन देखने को मिलते हैं। उनके बारे में हम डिटेल में बात करेंगे, जैसे- Related (Topics / Query) में इन चार पॉइंट्स को समझते हैं।

#1. Rising

गूगल ट्रेंड के रिलेटेड टॉपिक और क्वेरी सेक्शन में हमें Rising और Top दो option देखने को मिलते हैं।

Rising का अर्थ होता है – बढ़ता हुआ।

राइजिंग सेक्शन में वे Topics या Keyword दिखाए जाते है, जिनके सर्च रिजल्ट तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे विषय या कीवर्ड जिनकी रूचि या डिमांड लोगों में तेजी से आगे की ओर बढ रही है। इन टॉपिक्स या कीवर्ड का उपयोग करके आप अपने ब्लॉग को अपनी Target ऑडियंस तक पहुचा सकते हैं। 

#2. Top 

गूगल ट्रेंड के रिलेटेड टॉपिक और क्वेरी सेक्शन में राइजिंग ड्रापडाउन मेनू में Top सेलेक्ट करें। इस सेक्शन में वे Topics या Keyword दिखाए जाते हैं जो एक निश्चित समय में सबसे ज्यादा बार लोगों द्वारा सर्च किए गए हैं।

ये सर्च क्वेरी हाल फिलहाल की घटनाओं से रिलेटेड हो सकते हैं। इन सर्च क्वेरीज की मदद से आप एक अच्छा कंटेंट अपनी ऑडियंस की पसंद अनुसार लिख सकते हैं।

#3. Breakout

ये वे Topics या Keyword हैं, जिनकी खोज अचानक से बढ़ना शुरू हो गई है। जब लोगों की रूचि अचानक से किसी टॉपिक में बढ़ने लगती है तो ऐसे कीवर्ड को ब्रेकआउट में दिखाया जाता है। इसमें ज्यादातर वायरल विडियो या खबरें होती हैं।

#4. Percentage (%) का मतलब

Related Topics और Related Query में जो रिजल्ट दिखाए जाते हैं, उनमें कईं सारे रिजल्ट के सामने प्रतिशत में संख्या लिखी हुई होती है।जैसे – Robots.txt –  250% यह संख्या प्रतिशत कीवर्ड की खोज की बढ़ोतरी और घटोतरी के बारे में बताती है। इसका मतलब यह है, कि इस Robots.txt कीवर्ड की खोज में पहले कि तुलना में 250% की बढ़ोतरी हुई है।

अगर कीवर्ड के सामने +250% यानि यह संख्या प्लस सिंबल के साथ है, तो इस कीवर्ड की खोज में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन अगर कीवर्ड के सामने यह संख्या माइनस (-) सिंबल के साथ है, तो इस कीवर्ड की खोज में घटोतरी हुई है।

उदाहरण- अगर पहले किसी कीवर्ड की सर्च वॉल्यूम 100 थी। लेकिन अब यह सर्च वॉल्यूम बढ़कर 200 हो गयी है। इसका मतलब कीवर्ड की खोज 100% से बढ़ गयी है।

Google Trends का कैसे इस्तेमाल करें

अगर आप एक Beginner हैं, तो यह Google Trends Beginner Guide Hindi आपके लिए है। कुछ ऐसे नए ब्लॉगर और Youtuber’s होते हैं, जिनको Keyword Research करने के बारे में कुछ जानकारी नहीं होती है। इसके अलावा कुछ नए कंटेंट creator तो यह भी नहीं जानते है, कि Google Trends क्या है। इसीलिए वे अपनी टारगेट ऑडियंस तक नहीं पहुंच पाते हैं। 

अपनी टारगेट ऑडियंस तक पहुंचने के लिए आपको SEO और कीवर्ड रिसर्च करना आना चाहिए। आप SEO और Keyword Research के लिए गूगल ट्रेंड्स का इस्तेमाल कर सकते है। आपको Google Trends का इस्तेमाल करके कीवर्ड रिसर्च, Trending Topic और Trending Queries को कैसे खोजना है। यह सब कुछ सीखना होगा। गूगल ट्रेंडस को इस्तेमाल करने की गाइड नीचे स्टेप बाय स्टेप बताई गयी है।

How to find keywords in google trends: Beginners Guide

इन स्टेप्स को फॉलो करें –

स्टेप 1: Blogging Niche को चुनें

अपने Niche को जाँच लें, जिस पर काम करना चाहते हैं। जैसे- टेक्नोलॉजी, समाचार, हेल्थ आदि।

स्टेप 2: Explore सेक्शन का इस्तेमाल करें

यहां आप अपने Niche से रिलेटेड कीवर्ड्स डाल कर सर्च सकते हैं। इसके अलावा मेनू से Explore में जाकर सर्च बॉक्स में अपने Niche से जुड़ा कोई Seed Keyword डाल कर सर्च करें।

स्टेप 3: Filter सेक्शन का इस्तेमाल करें

अब आप अपने अनुसार फ़िल्टर लगा सकते हैं। फ़िल्टर के बारे में आप ऊपर पढ़ चुके हैं। फ़िल्टर लगा कर आप कंटेंट से रिलेटेड एक अच्छा कीवर्ड ढूंड सकते हैं। फ़िल्टर लगाने से मेरा मतलब केटेगरी, लोकेशन, टाइम और वेब सर्च है।

स्टेप 4: Related Query का इस्तेमाल करें

अब Related Query को देखें और अपने कंटेंट से मिलते- जुलते कुछ कीवर्ड को चुन लें।

स्टेप 5: Keyword Compare करें

अब मल्टीप्ल कीवर्ड को Compare box का इस्तेमाल करके Compare करें। कीवर्ड का टाइम ग्राफ चेक करें और trend देखें। उनका ग्राफ ऊपर या नीचे किस तरफ जा रहा है। जिस कीवर्ड का ग्राफ ऊपर की ओर दुसरे की तुलना में अधिक है, उसे चुन लें।

स्टेप 6: Tool का इस्तेमाल करें

अब किसी भी कीवर्ड रिसर्च करने वाले टूल को खोल लें। जैसे- Ahref या Google Keyword Planner.

स्टेप 7: Keyword के सर्च रिज़ल्ट को चेक करें

अब अपने चुने हुए कीवर्ड की सर्च वॉल्यूम और Keyword Difficulty चेक करें। इसके अलावा गूगल सर्च में अपने कीवर्ड को दो Comma लगाकर सर्च करें, और इसके सर्च रिजल्ट को भी चेक करें। जैसे – “Search Intent Kya Hai” 

Google trends पर Research के लिए Tips: 

  • गूगल रिजल्ट: ऐसे कीवर्ड का चुनाव करें जिसके रिजल्ट आपको गूगल में कम दिखाई दें।
  • Top क्वेरीज: इसे जरुर चेक करें क्योंकि इसमें हाई पोटेंशियल कीवर्ड मिल सकते हैं।
  • गहराई तक रिसर्च: Subregion या सिटी ऑप्शन का इस्तेमाल करके आप अपनी रिसर्च को अधिक गहराई तक लेकर जा सकते हैं। इससे अलग-अलग सिटी के लिए कीवर्ड की रूचि पता लगायी जा सकती है। इससे आप अपनी ऑडियंस जो अच्छे से टारगेट कर पाएंगे।
  • Analyse: न्यूज़ आर्टिकल और अपने Competitors को analyse करें।
  • Trend Alert: Google ट्रेंड अलर्ट को ऑन करें इससे आपको ट्रेंडिंग टॉपिक्स की जानकारी मिल सकती है।
  • Social Media: सोशल मीडिया पर लोगों की कमेंट्स पर ध्यान दें।

निष्कर्ष- Google Trends Kya Hai 

आशा करता हूं, Google Trends Kya Hai आपको समझ आया होगा। आज का लेख How To Find Keywords In Google Trends: Beginners Guide आपको पसंद आया होगा। क्योंकि इसमें मैने कुछ ऐसे पॉइंट्स को कवर किया है, जिससे आपको अपने कंटेंट की प्लानिंग के लिए Google Trends का सही इस्तेमाल करना आ जायेगा। 

इसके अलावा मैने इसमें बताया है, कि गूगल ट्रेंड्स कैसे काम करता है, गूगल ट्रेंड्स से कीवर्ड रिसर्च कैसे करें।

लेख पसंद आया हो, तो एक कॉमेंट अवश्य करें। धन्यवाद राधे राधे।

February 1, 2024 0 comments
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Blogging Niche kya hai
Blogging Tips

Blogging Niche Kya Hai,2024 में Blog के लिए Niche कैसे चुनें

by Krishnaa January 31, 2024
written by Krishnaa

Blogging Niche Kya Hai-आज के लेख ऐसे विषय पर है, जिसकी वजह से आपको ब्लॉगिंग के एक जरूरी हिस्से के बारे में जानकारी मिलेगी। जो ब्लॉगिंग में सबसे ज्यादा जरूरी है, लेकिन ज्यादातर नए ब्लॉगर इस स्टेप को छोड़ देते हैं, स्किप कर देते हैं। जिसकी वजह से आगे ब्लॉगिंग में मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है।

Blogging Niche Kya Hai

ज्यादातर नए ब्लॉगर, बिना किसी जानकारी के देखा-देखी में आकर ब्लॉग बना लेते हैं। इसके बाद वह उस ब्लॉग पर दिन रात कड़ी मेहनत करते हैं, ताकि उस ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा ऑडियंस आएं। 

लेकिन एक जरूरी स्टेप को स्किप करने से उनका ब्लॉग धीरे-धीरे डाउन हो जाता है। इसके कारण तो कई हो सकते है, लेकिन इसका सबसे बड़ा और मुख्य कारण है, एक ऐसी Blog Niche पर काम करना, जिसपर पहले से ही कंपटीशन मौजूद है। 

आज का लेख बेहद खास है, जो आपके लिए बेहद फायदेमंद साबित होगा। लेख में ये जरूरी पॉइंट्स शामिल हैं, फिर लेख शुरू करते हैं।

  • Blogging Niche Kya Hai
  • Blogging Niche के क्या फायदे हैं
  • Blogging Niche कितने प्रकार के होते हैं 
  • Blog के लिए Niche कैसे चुनें

Blog Niche क्या है- (Blogging Niche Kya Hai)

Niche का मतलब केटेगरी या सब्जेक्ट होता है। दूसरे शब्दों में समझाऊं तो आप अपना ब्लॉग किस सब्जेक्ट पर लिखते है या आप किसी केटेगरी पर ज्यादा ध्यान देते हैं। उसे Niche (निचे) कहते हैं।

उदाहरण देकर समझाने का प्रयास करता हूं, जैसे मेरे Techaasvik Blog पर, मैं हमेशा टेक्नोलॉजी से जुड़े आर्टिकल लिखकर पोस्ट करता रहता हूं। क्योंकि मेरा Techaasvik Blog की Niche, Technology है। 

उम्मीद करता हूं, की आपको समझ आ गया होगा की Blogging Niche Kya Hai? आगे जानते हैं, कि Niche के कितने प्रकार हैं?

ब्लॉग Niche कितने प्रकार के होते हैं

ब्लॉग नीच तीन तरह की होती हैं, ब्लॉगर इन्ही तीन प्रकार की नीच में से किसी एक को सिलेक्ट करके उसपर ब्लॉग लिखना शुरू करते हैं। यह तीन नीच कौन से हैं, आइए जानते हैं।

  1. Single Niche
  2. Multi Niche
  3. Micro Niche 

#1. Single Niche

यह एक ऐसी ब्लॉगिंग नीच है, जिसमे ब्लॉगर केवल एक ही टॉपिक या यूं कहें एक ही सब्जेक्ट पर काम करता है। अगर आपको ब्लॉग पर केवल एक ही टॉपिक पर कई आर्टिकल दिखाई देते हैं, तो आप समझ जाइए की वह ब्लॉग Single Niche Blog है। इस Niche पर काम करने से आप अपने ब्लॉग पर अच्छी-खासी ऑडियंस को टारगेट कर सकते हैं।

#2. Multi Niche

Multi Niche Blog एक ऐसी Blogging Niche है, जिसमे अलग-अलग टॉपिक पर बोहोत सारे आर्टिकल देखने को मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर कहूं तो, आपने हेल्थ, न्यूज ब्लॉग, बिज़नेस, फूड रेसिपी या टेक्नोलॉजी ये सभी Multi Niche Blog है।

ज्यादातर वह ब्लॉगर जो हिंदी में ब्लॉग लिखना पसंद करते हैं वह Multi Niche पर ही काम करते हैं। क्योंकि Multi Niche होने की वजह से ब्लॉग पर ज्यादा से ज्यादा ट्रेफिक आने की संभावना बन जाती है। 

#3. Micro Niche

Micro Niche Blog यह Single Niche Blog का ही एक हिस्सा है। क्योंकि Single Niche Blog में से किसी एक छोटे विषय या टॉपिक को चुनकर, उस Micro Niche Topic पर काम किया जाता है। 

उदाहरण के तौर पर कहूं, तो जैसे आपका ब्लॉग टेक्नोलॉजी पर है और आप इसी के एक पार्ट ऑटोमोबाइल टॉपिक पर ब्लॉग लिखते हैं। तो यह आपका Micro Niche Blog होगा।  

Blog के लिए Niche कैसे चुनें 

देखा-देखी के इस दौर में कुछ ऐसे नए ब्लॉगर हैं, जो सफल ब्लॉगर्स को देखकर ब्लॉगिंग की शुरुआत करते हैं। लेकिन उनके ब्लॉग पर वैसा ट्रेफिक नहीं आता, जेसा वह उम्मीद कर लेते हैं। ब्लॉग पर ट्रेफिक ना आने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन एक गलत Blogging Niche को चुनना यह भी एक मुख्य कारण हो सकता है। 

क्योंकि ब्लॉगिंग, सरकार की उस कुर्सी की तरह है। जिसके चार पैरो में से एक पैर भी टूटा तो ब्लॉगिंग का अंतिम सफर वही से शुरू हो जाता है। इसलिए ब्लॉग के लिए ऐसे Niche को चुनना चाहिए, जिसके बारे में आपको पूरी जानकारी हो।

एक सही Blogging Niche को चुनने के लिए आप इन तरीकों को अपना सकते हैं। मैं पूरी कोशिश करूंगा, की आज के इस लेख से आपको भरपूर जानकारी मिले। 

#1. Competition

किसी भी Blog Niche को चुनते समय, उसके साथ आने वाले कंपीटीशन का जरूर ध्यान रखना चाहिए। अगर आप ऐसे Blog Niche को चुन लेते हैं, जिसका सर्च वॉल्यूम सबसे ज्यादा है, पर उसका कंपटीशन सबसे ज्यादा है। ऐसे ब्लॉग नीच पर आपकी रुचि भले ही क्यूं ना हो, ऐसे ब्लॉग नीच पर काम करने से बचना चाहिए। 

ऐसा इसलिए क्योंकि, लोग पहले ही उस ब्लॉग नीच पर काम रहे हैं। आशा करता हूं, आपको समझ आ रहा होगा।

#2. Interest Niche को सिलेक्ट करें 

Blogging Niche को चुनते समय अपने इंटरेस्ट को ज़रूर ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि आपको एक ऐसा Niche सिलेक्ट करना होता है। जिसमें आप ज्यादा से ज्यादा आर्टिकल लिख पाए। अगर आपको किसी ऐसे विषय में जानकारी और रुचि है, तो आप लॉन्ग टर्म तक उस Blogging Niche पर काम कर सकते हैं।

जैसे- मेरी रुचि टेक्नोलॉजी और ब्लॉगिंग में है, और मैं केवल इन्हीं पर अपने आर्टिकल लिखता हूं। क्योंकि मुझे इनमें जानकारी है और मैं इसी के माध्यम से नई-नई जानकारी सीखता रहता हूं।  

#3. Monthly Search करें 

Monthly Search यानी Blogging Niche को सिलेक्ट करते समय आपको यह जरूर ध्यान रखना चाहिए, कि उस Blog Niche पर हर महीने में कितना ट्रेफिक आता है। 

#4. Trending Search करें

कभी-कभी Interest Niche पर बनाए गए ब्लॉग, सफल नहीं हो पाते हैं। क्योंकि बिना कीवर्ड रिसर्च किए और बिना उसका ट्रेंड जानें, अगर आप कोई ब्लॉग बना लेते हैं तो Blogging में सफल होने के लिए आपको देरी का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए Blogging Niche को चुनने से पहले उसके कीवर्ड रिसर्च जरूर करना चाहिए। इसके अलावा उस Blogging Niche के ट्रैंड को चेक जरूर करें। इसके लिए आप Google Trend का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। 

2024 में Blog के लिए Best Niche कौन से हैं

अब तक हमनें सीखा की Blogging Niche Kya Hai. अब बात आती है, कि 2024 में ऐसे कौन से Blog Niche हैं, जिनपर ब्लॉग बनाया जा सकता है।

  1. Studies And Training
  2. Technology and Computer Science
  3. Health And Fitness
  4. Tourism And Travel 
  5. Life And Self-improvement
  6. Art And Design
  7. Entertainment and Gaming
  8. News and Events
  9. Cooking And Baking
  10. Work And Business
  11. Money And Investment

निष्कर्ष- Blog Niche Kya Hai

मैने आज के इस लेख में आपको बताया है, कि 2024 में ऐसे कौन से Blog Niche हैं, जिनपर आप अपना ब्लॉग बना सकते हैं। इसके अलावा मैने बताया है, कि Blogging Niche Kya Hai, 2024 में Blog के लिए Niche कैसे चुनें।

आशा करता हूं, कि इस लेख को पढ़कर आपको आनन्द आया होगा। अगर हां, इस लेख को अपने ब्लॉगर दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें। अगर आपका इस लेख से जुड़ा कोई सवाल है या कोई सुझाव देना चाहते हैं, तो कृपा कॉमेंट करके जरूर बताएं। आपका धन्यवाद, राधे राधे।

January 31, 2024 0 comments
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Best Ai Tools For Video Creator
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8 Best Ai Tools For Video Creator in Hindi 2024

by Krishnaa January 22, 2024
written by Krishnaa

आज मैं आपको इस लेख में कुछ ऐसे Best Ai Tools For Video Creator के बारे में बताऊंगा, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अभी तक धमाल मचाया हुआ है। इन AI की मदद से आप 3d illustration, एनिमेटेड फेस वीडियो और अपनी वीडियो में केप्शन भी लगा सकते हैं।

Best Ai Tools For Video Creator

इस लेख को पूरा पढ़ने तक आप जान जायेंगें, की किस ए आई से क्या काम किया जा सकता है। 

Luma AI क्या है-

Luma AI इमेज में 3d Effect लगाने के काम आता है। इससे आप अपनी वीडियो में गेमिंग और कार्टून जैसी अट्रैक्टिव वीडियो बना सकते हैं। अगर आपके पास ड्रोन से शूट करने का बजट नहीं है, तो Luma AI की मदद से अपनी वीडियो में ड्रोन का इफेक्ट दे सकतें हैं। Luma AI की वेबसाइट के अलावा आप इसके App का इस्तेमाल कर सकते हैं। इस ऐप को आप प्ले स्टोर से डाउनलोड कर सकते हैं।

Luma AI का इस्तेमाल करना सीखें-

  • सबसे पहले आपको गूगल में Luma AI लिखकर सर्च करना है।
  • Luma AI पर अपना अकाउंट बनाना है।
  • 3d वीडियो या इमेज को बनाने के लिए उसके चार अलग ऐंगल के फोटो को अपलोड करना है।
  • Luma AI इमेज और वीडियो को समझकर उसका 3d मॉडल बनाकर देगा।

Spikes Studio क्या है-

आपने यूट्यूब या इंस्टाग्राम पर मोटिवेशन पॉडकॉस्ट की शॉर्ट क्लिप देखी होंगी। Spikes Studio से बड़ी वीडियो की शॉर्ट क्लिप बना सकते हैं।

बड़ी वीडियो की क्लिप बनाना सीखें-

  • Spikes Studio की वेबसाइट पर आना है।
  • Youtube Video की यूआरएल को कॉपी करके Enter URL में Paste करना है।
  • वीडियो क्लिप की लेंथ को सिलेक्ट करना है।
  • Subtitle की Tone को सिलेक्ट करना है।

ये प्रोसेस पूरा होने के बाद, कुछ शॉर्ट क्लिप बनाकर देगा। जिसे आप किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपलोड कर सकते हैं।

Maestra ai क्या है-

Maestra AI एक ऐसा AI है, जिसका इस्तेमाल करके आप अपनी वीडियो में 90 से भी ज्यादा अलग-अलग भाषाओं में वॉइस डबिंग कर सकते हैं। इसके कुछ और भी फीचर्स हैं, जैसे- 

  • वीडियो में 125 से ज्यादा भाषाओं में सबटाइटल को लगा सकते हैं।
  • किसी वीडियो या उसके यूआरएल को पेस्ट करके उसकी Transcript बना सकते हैं। 
  • Text लिखकर उसकी वॉइस ओवर ऑडियो बना सकते हैं।
  • वीडियो को टेक्स्ट में बदल सकते हैं।
  • बाद में अपने हिसाब से वीडियो एडीटर में एडिट और सेटिंग कर सकते हैं।

वीडियो में Subtitle लगाना सीखें-

  • गूगल में Maestra ai लिखकर सर्च करना है।
  • वेबसाइट को ओपन करके अकाउंट बनाना है।
  • इसके बाद Subtitle पर सिलेक्ट करना है। (ऐसे ही आप किसी भी फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं)
  • Choose File पर सिलेक्ट करके वीडियो के फॉर्मेट को सिलेक्ट करना है।
  • सबटाइटल के लिए भाषा को सिलेक्ट करना है।
  • Upload File पर सिलेक्ट करना है।

वीडियो रेडी होने के बाद, Maestra ai आपके द्वारा बनाए गए अकाउंट पर लिंक भेजी जाएगी। जिसको आप ओपन करके Export कर सकते हैं।

Canva क्या है- 

Canva Graphic Designer का एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जिसकी मदद से आप अपने ब्लॉग या वीडियो के लिए अट्रैक्टिव और Catchy Thumbnail बना सकते हैं। Canva को अलग-अलग कामों के लिए यूज किया जा सकता है, जिसमें ये कुछ फीचर्स शामिल हैं।

Canva के 10 फायदे क्या हैं- (What Are The 10 Benefits of Canva)

  1. Canva पर बैनर बना सकते हैं।
  2. Logo बना सकते हैं।
  3. Thumbnail Design कर सकते हैं।
  4. ब्लॉग के लिए Infographics बना सकते हैं।
  5. वीडियो क्रिएट कर सकते हैं।
  6. टेंपलेट्स बना सकते हैं।
  7. वेबसाइट लेंडिंग पेज डिजाइन कर सकते हैं।
  8. ब्लॉग के लिए आइकन और एलिमेंट्स का इस्तेमाल करके ग्राफिक्स बना सकते हैं।
  9. E- Learning Course के ग्राफिक्स बना सकते हैं।
  10. सोशल मीडिया प्लेटफार्म के लिए शॉर्ट क्लिप या रील बना सकते हैं।

वीडियो बनाना सीखें-

  • अपने ब्राउज़र में Canva.com की वेबसाइट को ओपन करना है या मोबाइल में यूज करने के लिए आपको प्ले स्टोर से Canva App को डाउनलोड करना है।
  • इसके बाद सर्च बॉक्स में Mobile Video लिखकर सर्च करके Mobile Video के ऑप्शन पर सिलेक्ट करना है।
  • वीडियो डिजाइन को सिलेक्ट करना है।

अब अपने हिसाब से वीडियो में एडिट कर सकते हैं, Canva में आपको Text, Font, Animation, Colour जेसे कई प्रकार के फीचर्स मिलेंगे। जो आपको वीडियो एडिट करने में सहायता करेगी।

Bing AI Image Creator क्या है-

Bing AI, गूगल के जेसा ही एक सर्च इंजन है। इसे माइकोसॉफ्ट कंपनी के द्वारा बनाया गया है। Bing AI यूजर के सवालों के जवाब इनफॉरमेशन के साथ इंटरनेट से ढूंढकर, यूजर को दिखाता है। वैसे ही Bing AI Image Creator है, जो यूज़र के द्वारा दिए गए टेक्स्ट प्रॉम्प्ट से इमेज जनरेट करके देता है।

हाल ही में सोशल मीडिया के इंस्टाग्राम प्लेटफॉर्म पर 3d Image का ट्रेंड छाया हुआ है। जो लोगों को काफी पसंद आ रहा है, आपने भी इंस्टाग्राम पर ज्यादातर सोशल मीडिया वाली 3d Image की वीडियो देखी होंगी। 

जिसमें एक लड़का सोशल मीडिया के आइकन पर बैठा हुआ होता है, और उसके पीछे बैकग्राउंड में सोशल मीडिया प्रोफाइल होती है। इसी 3d Image को कैसे बनाते हैं, इसे समझते हैं।

3d Illustration Image बनाना सीखें-

3d Image को App और वेबसाइट दो तरीकों से बना सकते हैं, दोनों तरीके नीचे बताए गए हैं।

1. एप से बनाएं

प्ले स्टोर से Bing AI के ऐप को डाउनलोड करके Image Creator पर सिलेक्ट करना है। इसके बाद टेक्स्ट प्रॉम्प्ट को बॉक्स में पेस्ट करके Surprise Me पर सिलेक्ट करना है।

2. वेबसाइट से बनाएं

अपने ब्राउज़र में Bing AI Image Creator की वेबसाइट को ओपन करना है। दिए गए Box में टेक्स्ट प्रॉम्पट को पेस्ट करना है, और Join & Create के ऑप्शन पर सिलेक्ट करना है। कुछ समय लेने के बाद चार इमेज जनरेट करके दिखाता है।

Prompt- 1
create a 3d image,A 25 year old boy is sitting on his chair in the techaasvik YouTube studio and talking to a beautiful 25 year old girl.  There is Facebook logo in the background which looks very beautiful.

Prompt- 2
Create a 3D illustration of an animated character sitting casually on top of a social media logo "instagram". The character must wear casual modern clothing such as jeans jacket and sneakers shoes. The background of the image is a social media profile page with a user name "Profile Name" and a profile picture that matches the animated character. Make sure the text is not misspelled.

Renderforest क्या है-

Renderforest एक ऐसा पावरफुल एआई है, जिससे Youtube Video के लिए Intro, Presentation बना सकते हैं। इसके अलावा इसमें कुछ ऐसे फीचर्स हैं, जो आपके बोहोत काम आ सकते हैं।

1. Logo बना सकते हैं

इससे Youtube Channel Logo, Instagram Profile Logo, Website के लिए Logo और Favicon बना सकते हैं।

2. Mockup बना सकते हैं

इससे Iphones Mockup, Book Mockup, Logo Mockup, Business Card Mockup आदि बना सकते हैं।

3. Landing Page बना सकते हैं 

इससे वेबसाइट के लिए Landing Page, एक पेज की वेबसाइट और वैडिंग इन्विटेशन पेज बना सकते हैं।

4. Graphics बना सकते हैं

इससे आप यूट्यूब के लिए थंबनेल, यूट्यूब बैनर, प्रेजेंटेशन और सोशल मीडिया के लिए पोस्टर बना सकते हैं।

5. Video बना सकते हैं

इससे एनीमेशन वीडियो, कार्टून एनीमेशन बना सकते हैं। अपने बिजनेस का नाम जनरेट कर सकते हैं।

Mockup बनाना सीखें-

  • Renderforest की वेबसाइट पर आना है।
  • सबसे नीचे स्क्रॉल करके, किसी एक Mockup के ऑप्शन पर सिलेक्ट करना है।
  • अपने पसंद के किसी भी एक मॉकअप पर सिलेक्ट करके एडिट करना है।
  • इसके बाद अपने मॉकअप को डाउनलोड करना है।

Elevenlabs क्या है-

यह एक ऐसा AI Tool है, जिससे आप वॉइस का क्लोन, वॉइस डबिंग, एआई के द्वारा 29 से भी ज्यादा भाषाओं में टेक्स्ट से स्पीच क्रिएट कर सकते हैं। 

अकसर आपने देखा होगा कि सोशल मीडिया पर एआई जनरेटेड रील और शॉर्ट वायरल होती हैं। इन वीडियो में एआई की आवाज दी गई होती है। अगर आपको भी इसी AI की आवाज में अपनी वीडियो को बनाना है, तो इन तरीकों को फॉलो करें।

Text से वॉइस तैयार करना सीखें-

  • Elevenlabs की वेबसाइट को ओपन करना है।
  • वीडियो की स्क्रिप्ट को दिए गए बॉक्स में पेस्ट करना है। 
  • उपर दी गई भाषा को सिलेक्ट करना है।
  • वॉइस ओवर के लिए किसी एक वॉइस टोन को सिलेक्ट करना है।
  • डाउनलोड के आइकन को सिलेक्ट करके डाउनलोड करें।

Pictory ai क्या है-

यह एक वीडियो एडीटर सॉफ्टवेयर होता है, जो यूज़र के लिखे गए टेक्स्ट का इस्तेमाल करके एक वीडियो बनाकर देता है। पहले ये एआई यूजर्स के लिए ट्रायल पर था, लेकिन अब इसका प्रीमियम आ गया है। जिसका आपको कुछ भुगतान करना पड़ता है। Pictory AI के कुछ Alternative AI हैं, जिनका आप इस्तेमाल कर सकते हैं।

  • Steve AI 
  • Synthesia AI
  • InVideo AI 

Text से वीडियो बनाना सीखें-

इसके लिए Pictory AI की जगह InVideo AI का इस्तेमाल करके वीडियो को बनाते हैं।

  • सबसे पहले InVideo AI की वेबसाइट पर आना है।
  • अपने अकाउंट बना लेना है।
  • अब अपनी वीडियो टाइप का चुनाव करें जैसे इंट्रो वीडियो और स्लाइडशो आदि।
  • अब इनपुट बॉक्स में अपनी वीडियो स्क्रिप्ट या टेक्स्ट पेस्ट करें। 
  • अब Generate पर क्लिक करें।
  • अब विडियो के तैयार होने का इंतजार करें। 
  • अब वीडियो बनने के बाद अपनी पसंद का म्यूजिक, एनीमेशन या इफ़ेक्ट लगा लेना है।
  • अब अपनी वीडियो को डाउनलोड कर लें। 

निष्कर्ष- Best Ai Tools For Video Creator

आशा करता हूं, आपको आज का लेख पसंद आया होगा। अगर आपको ऐसे ही किसी AI Website के बारे में जानकारी है, तो कॉमेंट करके बताएं। धन्यवाद, राधे राधे।

January 22, 2024 0 comments
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Podcast Kya Hai in Hindi 2024: किस प्लेटफॉर्म्स पर और कैसे बनाएं

by Krishnaa January 5, 2024
written by Krishnaa

आज के समय में डिजिटल मीडिया में पॉडकास्ट की लोकप्रियता काफी आगे बढ़ रही है। जिसके चलते लोग, पॉडकास्टिंग को सुनना पसंद कर रहे हैं और इस फील्ड को आजमाना चाहते हैं। पॉडकास्ट के जरिए आप अपनी नॉलेज और अपने एक्सपीरियंस को अपने ऑडियंस तक पहुंचा सकते हैं। आज के विषय “Podcast kya hai in hindi” है , यह कैसे काम करता है, इसी अच्छे से समझेंगे। 

Podcast Kya Hai In Hindi

अगर आपके मन में भी इन सवालों का जवाब जानने की उत्सुकता है, तो आप इस आर्टिकल को जरूर पढ़ें। इस लेख में, हम आपको पॉडकास्ट के बारे में सब कुछ बताएंगे, जैसे कि पॉडकास्ट क्या है, कैसे बनाएं, पॉडकास्ट का इतिहास, पॉडकास्ट के प्रकार, पॉडकास्ट के फायदे, पॉडकास्ट के उदाहरण, आदि।  

पॉडकास्ट क्या है- (Podcast Kya Hai In Hindi)  

अगर देखा जाए तो पॉडकास्ट शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों से हुई हैं, पॉड और ब्रॉडकास्ट। इसमें POD का मतलब प्लेयेबल ऑन डिमांड है। इसका इस्तेमाल ब्लॉग और वेबसाइट पर भी आसानी से किया जा सकता है।

यह एक डिजिटल ऑडियो प्लेटफॉर्म होता है, इसके माध्यम से हम अपनी आवाज को ऑडियो फॉर्म में रिकॉर्ड करके अलग-अलग प्लेटफार्म पर अपलोड कर सकते हैं। इस तरह पॉडकास्टिंग करके अपनी आवाज को दुनिया भर के लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

पॉडकास्ट ऑडियो और वीडियो एपिसोड की एक सीरीज होती है। पॉडकास्ट के इन एपिसोड को आप आसानी से स्मार्टफोन,आईपॉड, कंप्यूटर या कार में भी सुना सकते हैं। पॉडकास्ट बनाने और इसे इन्टरनेट पर अपलोड करने वाले व्यक्ति को पॉडकास्टर कहा जाता है।

कुछ पॉडकास्ट के पोपुलर उदाहरण हैं –

  • Google Podcast 
  • Pocket FM
  • Kuku FM
  • Spotify Podcast
  • Audible 
  • Anchor FM

पॉडकास्ट का इतिहास क्या है-

पॉडकास्ट शब्द की उत्पति 2004 में डेव विनर और एडम करी द्वारा की गई थी। इन्होंने एक ऐसा सॉफ्टवेयर बनाया, जिसमें ऑडियो को किसी दूसरे डिवाइस में ट्रांसफर किया जा सकता है। 

इस तकनीक की वजह से लोग किसी भी जगह पर आसानी से अपने पसंद के न्यूज या दूसरे प्रोग्राम की ऑडियो अपने डिवाइस पर सुन सकते हैं। Podcast के ये कुछ विषय हैं, जैसे- Health, Entertainment, Game’s, Education आदि।

पूरी दुनिया में, आज के समय में 1 बिलियन से भी ज्यादा लोग Podcast को सुनना पसंद करते हैं। अगर भारत में पॉडकास्ट सुनने वालों की संख्या की बात करें, तो 2023 के आंकड़े के अनुसार 176 मिलियन लोग पॉडकास्ट अपने डिवाइस में सुनते हैं। 

पॉडकास्ट करने के क्या फ़ायदे हैं- 

  • पॉडकास्ट से अपने एक्सपीरियंस, नॉलेज और कंटेंट को ऑडियो में बनाकर लोगो तक पहुंचा सकते हैं।
  • ज्यादा से ज्यादा ऑडियंस के साथ जुड़ सकते हैं और अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।
  • किसी भी प्रकार के डिवाइस (मोबाइल, लैपटॉप, आदि) में अपने पसंद का पॉडकास्ट सुन सकते हैं।
  • इसके इस्तेमाल से आप अपना ब्रांड के नाम की अच्छी-खासी पहचान बना सकते हैं।
  • अगर आप कहीं जा रहे हैं, तो ब्लॉग और विडीयो देखने के बजाय पॉडकास्ट ज्यादा बेहतर ऑप्शन हो सकता है। 
  • कहीं पर ट्रेवल करते हुए, पॉडकास्ट सुनकर किसी भी Topic पर जानकारी आसानी से ली जा सकती है।

पॉडकास्ट करने के क्या नुक्सान-

अगर पॉडकास्ट करने के फायदे हैं, तो इसके कुछ नुकसान भी हैं। जो इस प्रकार हैं- 

  • पॉडकास्ट रिकॉर्ड करने से पहले कंटेंट रिसर्च के साथ अच्छी प्रेजेंटेशन भी जरूरी होती है इसमें समय लग सकता है।
  • पॉडकास्ट शुरू करने और सुनने के लिए इन्टरनेट की जरुरत पड़ती है।
  • ऑडियंस बनाए रखने के लिए प्रतिदिन एंगेजिंग और अच्छा क्वालिटी कंटेंट पब्लिश करना पड़ता है। जो आपके लिए काफी चैलेंजिंग हो सकता है।
  • पॉडकास्ट को शरू करने के लिए कुछ जरूरी चीज़ें चाहिए होती हैं, और इन पर कुछ खर्च हो सकता है। जैसे- एक अच्छा इन्टरनेट कनेक्शन, एक अच्छा Mic और एक एडिटिंग सॉफ्टवेर आदि।
  • अपने पॉडकास्ट ब्रांड को आगे बढ़ाने के लिए आपको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए अलग-अलग प्लेटफार्म का इस्तेमाल करना होता है। इस फील्ड को सीखते और समझते रहना होगा।
  • अपने कंटेंट को कॉपीराइट जेसी समस्या से बचाना आपके लिए चुनौती साबित हो सकती है।

पॉडकास्ट कितने प्रकार के होते हैं-

पॉडकास्ट के 6 प्रकार के होते हैं, जिसमें ये सब शामिल हैं।

  • Interview Podcast 
  • Narrative Podcast
  • Educational Podcast
  • Conversational podcasts
  • Panel Podcast
  • Solo Podcast

1. Interview Podcast 

इंटरव्यू पॉडकास्ट में एक या अधिक व्यक्ति अतिथि को को आमंत्रित करते हैं पॉडकास्टर द्वारा हमेशा किसी चर्चित व्यक्ति को अतिथि के रूप में बुलाया जाता है। इंटरव्यू पॉडकास्ट के हर नए एपीसोड में एक नए अतिथि को आमंत्रित किया जाता है इस प्रकार के पॉडकास्ट में पॉडकास्टर अतिथि से उनके जीवन भर के अनुभव और विषय से संबंधित सवाल जवाब करता है

पॉडकास्टर हमेशा अतिथि से कुछ अनोखे सवाल करता है अतिथि भी उन सवालों के जवाब अपने एक्सपीरियंस से देते हैं जिससे ऑडियंस को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है इस प्रकार के पॉडकास्ट काफी ज्यादा इनफॉरमेशनल और रोचक साबित हो सकते हैं

2. Narrative Podcast

Narrative यानी कथा, इसमें पॉडकास्टर अपनी आवाज में इतिहास या कहानी को सुनाता है। इस पॉडकास्ट को सुनने से लोगों को मनोरंजन के साथ किसी विषय पर नॉलेज और इतिहास से जुड़ी जानकारी से सीखने को मदद मिलती है।

3. Educational Podcast

यह पॉडकास्ट एजुकेशन से जुड़े होते हैं, जिनमें पॉडकास्टर Educational, Professional, Personal Development से जुड़े विषयों पर बात करता है। पॉडकास्ट शिक्षा से संबंधित अनुभव और विचारसांझा करके ऑडियंस को जागरुक करते हैं। इस प्रकार के पॉडकास्ट को सुनने से लोगों को अपने प्रति आत्मविश्वास, अपनी एबिलिटी और नए नए स्किल को सीखने में मदद मिलती है।

4. Conversational podcasts

इस प्रकार के पॉडकास्ट में पॉडकास्ट किसी विशेष विषय पर अतिथि से बातचीत करता हैऔर यह बातचीतमूल रूप से आम बातचीत की तरह होती है। जैसे आपने किसी रेडियो या Fm कार्यक्रम की बातचीत को सुना होगा।

5. Panel Podcast

जब एक से अधिक व्यक्ति एक जगह पर बैठकर किसी विशेष विषय पर बातचीत करते हैं, तो इस पैनल कहा जाता है। जैसे न्यूज़ चैनल में एक एंकर 6 या 7 लोगों के साथ किसी विशेष विषय पर चर्चा करता है। इस तरह के समूह को पैनल कहा जाता है। 

इसी तरह के समूह में की गई चर्चा को हम पैनल पॉडकास्ट कह सकते हैं। पैनल पॉडकास्ट में एक से अधिक लोग होते हैं,जो एक निश्चित टॉपिक पर बातचीत करते हैं। ऐसे पॉडकास्ट लोगों को काफी पसंद भी आते हैं।

6. Solo Podcast

इस पॉडकास्ट में केवल एक ही पॉडकास्टर होता है। सोलो पॉडकास्ट में पॉडकास्ट अक्सर हर एपीसोड में एक याअधिक विषयों पर बातचीत करता है। पॉडकास्टर बातचीत को छोटे-छोटे बिंदुओं में ऑडियंस को बताता रहता है।

सबसे अच्छा हिंदी पॉडकास्ट प्लेटफार्म कौन सा है-

  1. Gaana (गाना)
  2. Khabri (खबरी)
  3. Hubhopper (हब हॉपर)
  4. Aawaz (आवाज)

पॉडकास्टिंग क्या है- 

जिन ऑडियो प्लेटफार्म पर Podcast कंटेंट को सुना जाता है, उन्हें पॉडकास्टिंग कहते हैं। जिसमें Kuku FM, Pocket Fm और Spotify Podcast शामिल हैं। 

पॉडकास्टिंग कैसे शुरू करें- (How to Start Podcasting) 

पॉडकास्टिंग शुरू करना मुश्किल काम नहीं है, बस आपको इन सभी बातों को ध्यान में रखना है। 

पॉडकास्टिंग होस्टिंग चुनें-   

होस्टिंग, आपके रिकॉर्डेड पॉडकास्ट को इंटरनेट पर अपलोड करने का एक आसान जरिया है। इसीलिए पॉडकास्ट शुरू करने से पहले एक अच्छी होस्टिंग की जरूरत होती है। 

रिकॉर्डेड पॉडकास्ट को इंटरनेट पर अपलोड करके उसे आगे भविष्य के लिए Save रखने और हेंडल करने के लिए होस्टिंग की अधिक आवश्यकता होती है। आप अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से कोई भी अच्छी होस्टिंग चुन सकते हैं। 

जैसे –

  • SoundCloud
  • Podbean
  • Buzzsprout
  • Kuku FM
  • Google Podcast
  • Pocket FM

पॉडकास्ट के लिए केटेगरी चुनें-   

पॉडकास्ट शुरू करने के लिए आपको एक ऐसी कैटेगरी का चुनाव करना होगा। जिसमें आपकी सबसे अधिक रुचि है। क्योंकि अगर आप अपनी रुचि के हिसाब से केटेगरी का चुनाव करते हैं, तो आप अपनी ऑडियंस को ज्यादा से ज्यादा कंटेंट प्रदान कर सकते हैं। 

जिस तरह मेरी रुचि टेक्नोलॉजी में है, इसलिए मैं हमेशा इसी कैटेगरी पर कंटेंट लिखता रहता हूं। आपके इन पॉडकास्ट कैटेगरी में आपको रुचि ढूंड सकते हैं –

  1. इतिहास
  2. राज्यों का इतिहास
  3. राजनीति
  4. अर्थव्यवस्था
  5. संस्कृति
  6. विज्ञान और प्रौद्योगिकी
  7. व्यापार
  8. फिल्मों का इतिहास
  9. खेल
  10. समाज

पॉडकास्ट के लिए एक नाम चुनें-  

पॉडकास्ट शुरू करने से पहले आपको एक यूनिक नाम चुनना होगा। जो आपके टॉपिक या केटेगरी से मेल खाता होना चाहिए। पॉडकास्ट का नाम चुनते हुए यह ध्यान में रखना चाहिए, कि वह आपकी ऑडियंस को आकर्षित करेगा या नहीं। इसलिए नाम ऐसा होना चाहिए जो सुनते ही आपकी ऑडियंस को याद हो जाए। 

पॉडकास्ट के Logo को बनाएं-

पॉडकास्ट बनाने के बाद आपको एक अट्रैक्टिव Logo बनाना जरूरी है। क्योंकि लोगों आपके पॉडकास्ट की पहचान होती है। अगर आपका पॉडकास्ट भविष्य में ऊंचाइयां प्राप्त करता है, तो आपका Logo एक ब्रांड बन जाएगा। इसलिए पॉडकास्ट का Logo आकर्षक होना चाहिए।

पॉडकास्ट रिकॉर्डिंग के लिए MIC चुनें- 

पॉडकास्ट को ज्यादा अच्छा बनाने के लिए उसकी आवाज को हाई क्वालिटी पर रखना जरूरी होता है। क्योंकि सुनने वाले को पॉडकास्टर की आवाज साफ और क्लियर सुनाई देनी चाहिए। इसके लिए आपके पास एक अच्छा माइक जरूर होना चाहिए। आजकल मार्केट में बहुत सारे ऐसे माइक आसानी से मिल जाते हैं जिनमें बैकग्राउंड नॉइस कैंसिलेशन फीचर होता है।

पॉडकास्ट के लिए टॉपिक चुनें-

पॉडकास्ट भी ब्लॉगिंग करने जैसा ही है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें ऐसे टॉपिक्स का सिलेक्शन करना जरूरी होता है। जिसमें आप ज्यादा से ज्यादा कंटेंट पोस्ट कर सकें। इसलिए एक ऐसा टॉपिक चुनना चाहिए, जिसमें आपकी रुचि हो या किसी काम में आपका एक्सपीरिएंस है।

पॉडकास्ट के लिए एक Cover बनाएं-

पॉडकास्ट में बाकी सब चीज़े एक तरफ और पॉडकास्ट का कवर एक तरफ, क्यूंकि कवर में आपके पॉडकास्ट की एक छोटी सी प्रीकेप होता है। जिससे पॉडकास्ट सुनने वाले को आपके पॉडकास्ट में ज्यादा दिलचस्पी आती है, और आपके पॉडकास्ट ऑडियो को ज्यादा लिसनर मिलते हैं। इसलिए पॉडकास्ट को ज्यादा आकर्षित बनाने के लिए उसके Cover को आकर्षित बनाना जरूरी होता हैं।

पॉडकास्टिंग के लिए एडिटर सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन चुनें-

पॉडकास्ट को रिकॉर्ड और एडिट करने के लिए आपको एक अच्छे से सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन की आवश्यकता होती है। इसके उपयोग करके आप आसानी से पॉडकास्ट को रिकॉर्ड कर सकते हैं। एक ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करें जो आपकी आवाज की फ्रीक्वेंसी को कम ना करें और जिसमे बैकग्राउंड नॉइस कैंसिलेशन जैसे ऑप्शन भी मौजूद हो।

जैसे –

  • Audacity
  • GarageBand
  • Anchor.fm
  • Dolby audio
  • Adobe Audition

निष्कर्ष- Podcast Kya Hai in Hindi

आज का पूरा लेख Podcast Kya Hai in Hindi पर है। जिसमें मैने आपको बताया है, कि पॉडकास्ट करने के क्या फ़ायदे हैं और पॉडकास्ट कैसे शुरू करें। आशा करता हूं, आपको यह लेख पसंद आया होगा। अगर आपका इस लेख से जुड़ा कोई सवाल है तो अपने सवाल को कॉमेंट करें। 

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Core Web Vitals INP Issue Kya Hai
Blogging Tips

Core Web Vitals INP Issue Kya Hai: कैसे ठीक करें,5 चीजें करें

by Krishnaa January 2, 2024
written by Krishnaa

रैंकिंग के लिए वेबसाइट या वेब पेज की परफॉरमेंस अच्छी  होना जरूरी होता है। Google, Core Web Vitals के जरिए किसी वेबसाइट की परफॉरमेंस को मापता है। Core Web Vitals के चार पार्ट हैं, LCP, FCP, CLS, FID जिसको गूगल द्वारा की गई घोषणा के अनुसार 2024 में Inp द्वारा बदला जाएगा। 

Core Web Vitals INP Issue Kya Hai

आज के लेख में जानेंगे,Core Web Vitals INP Issue Kya Hai, Inp Issue क्यों आता है। इससे Seo Ranking पर क्या असर पड़ सकता है, और Core Web Vitals Inp Issues को कैसे ठीक कर सकते हैं। 

FID क्या है 

किसी वेब पेज पर क्लिक करने से लेकर उसके जवाब देने तक के समय को First Input Delay (FID) कहते हैं।

INP क्या है – (Core Web Vitals INP Issue Kya Hai)

Google Inp– इसको पूरे शब्दों में Interaction To Next Paint कहते हैं। यह वेबसाइट या वेब पेज के Responsive Stability को बताता है, कि वह Responsive है या नहीं। Google Inp, यूजर्स के Interaction पर ध्यान रखता है। 

यूजर के नजरिए से समझते हैं– जब आप किसी वेबसाइट को ओपन करके उसमें अपना कोई काम करते हैं। कोई एक्शन लेते हैं या किसी बटन पर क्लिक करते हैं, तो वेबसाइट आपके जवाब का कितने समय में रिस्पॉन्स करती है। इसी कार्य को पेंट कहते हैं।

अगर आपको वेबसाइट के जवाब देरी से मिलते हैं, तो आपको लगेगा की वेबसाइट सही तरीक़े से काम नहीं कर रही है। इस क्रिया से पता चलता है, कि वेबसाइट कितनी स्पीड में काम करती है। इस क्रिया को हम Interaction Delay कहते हैं।

Google Inp आपको बताता है, कि वेबसाइट आपके पूछे गए सवाल का जवाब देने में कितना समय लगाती है। अगर वेबसाइट का Inp स्कोर ज्यादा होता है, तो वेबसाइट आपके द्वारा किए गए किसी भी कार्य या आपके इनपुट का रिस्पॉन्स देने में देरी करती है। जो बिल्कुल भी सही नहीं है, आगे जानेंगे एक अच्छा आईएनपी स्कोर क्या है।

Inp के लिए अच्छा स्कोर क्या होना चाहिए- 

अगर Inp का स्कोर 200 मिलीसेकंड या इससे कम है, तो यह आपकी वेबसाइट के लिए अच्छा है। अगर यह स्कोर 200 से 400 मिलीसेकंड के बीच तक है, तो आपको एक Warning मिलेगी। 400 मिलीसेकंड या उससे ज्यादा का स्कोर देखने को मिलता है, तो यह स्कोर वेबसाइट के लिए बोहोत बुरा साबित हो सकता है। इसके लिए आपको Core Web Vitals को सुधारने की जरूरत होगी। 

INP Issue चेक करने के लिए टूल्स क्या हैं-

Google Inp का स्कोर देखने के लिए आप इन टूल्स का इस्तेमाल कर सकते हैं।

  • Chrome Dev Tools
  • PageSpeed Insights
  • Lighthouse
  • Webpage Text

INP का Seo पर प्रभाव- 

Google INP का Seo पर गलत असर भी पड़ सकता है क्योंकि अगर वेबसाइट यूजर के जवाब देने में देरी करती है तो यूजर्स पेज को छोड़कर भी जा सकते हैं। जिससे पेज का बाउंस रेट, पेज की रैंकिंग और User Experience पर गलत असर पड़ता है। 

FID और INP में क्या अंतर है- (FID Vs INP)

INP और FID दोनों ही वेबसाइट की स्पीड और परफॉर्मेस चेक करने के लिए बनाया गया है। लेकिन इन दोनों में कुछ अंतर भी है।

INP FID 
INP, User Experience और पेज की क्वालिटी पर ध्यान रखता है। Core Web Vitals INP, वेबसाइट के पार्ट्स को Improve करने का काम करता है।FID पहले वेबसाइट की स्पीड का अंदाजा लगाता है, और उसपर ध्यान रखता है।
INP यूज़र और वेबसाइट के बीच जुड़ने के समय को देखता है, कि वेबसाइट यूजर के रिजल्ट को समझने में और उसका रिज़ल्ट स्क्रीन पर दिखाने में कितना समय लगाता है।Core Web Vitals First Input Delay, ब्राउज़र के रिस्पॉन्स पर ध्यान रखता है की वह यूजर के इनपुट का कितना समय लगाता है।

Interaction To Next Paint (INP) कैसे ठीक करें 

Google Core Web Vitals Inp को ठीक करने के लिए इन्हें पढ़ें।

इनपुट Delay को कम करें 

इनपुट डिले वह होता है, जब यूजर किसी वेबसाइट को अपने मोबाइल या किसी अन्य डिवाइस में ओपन करता है, तो वेबसाइट यूजर के इनपुट का रिस्पॉन्स देने में कितना समय लगाती है। इनपुट डिले में जैसे माउस, टचस्क्रीन, कीबोर्ड जेसे इनपुट डिवाइस शामिल हैं। इसको कम करने के लिए आपको इनपुट डिवाइस, मोनिटर, V-Sync और फ्रेम रेट कि सेटिंग को चेक करना चाहिए।

Long Tasks को Optimize करें 

किसी भी ब्राउज़र का काम पेज को दिखाना होता है। पेज दिखाने के लिए ब्राउज़र को HTML, Javascript जेसे कोड को पढ़ना और समझकर यूजर की स्क्रीन पर दिखाना होता है। अगर ब्राउज़र ये समझने में 50 मिलीसेकंड से ज्यादा का समय लगाता है, तो इसी क्रिया को Long Task कार्य कहते हैं। यह ब्राउज़र के काम को रोककर Fid Issue बढ़ा देता है।

Long Tasks को ठीक कम करने के लिए आप इन स्टेप्स को फ़ॉलो कर सकते हैं।

  • Javascript Code को कम करें।
  • वेबसाइट के Server Response के समय में सुधार करें।
  • वेब पेज के कंटेंट जैसे फॉन्ट, इमेज, वीडियो की क्वालिटी में सुधार करें।
  • वेबसाइट के कंटेंट को Lazy Loading की सहायता से लोड करें।

लेआउट Thrashing में सुधार करें 

इससे बचने के लिए DOM के Read और Write को एक साथ करने से बचना होगा क्योंकि इसके एक साथ होने से कईं सारी लेआउट स्टाइल को दोबारा गिन लिया जाता है। जिससे परेशानी का सामना करना पड़ता है। यह सब कुछ Javascipt में स्टाइल अपडेट करने के तुरंत बाद उसे पढने के लिए Request भेजने से होता है। ऐसा करने पर हम ब्राउज़र को वेब पेज के अपडेटेड एलिमेंट्स को जल्दी से दिखाने पर मजबूर करते हैं। इससे स्पीड कम हो जाती है। 

डॉम साइज़ को कम करें 

DOM यानी Document Object Modal, यह नोड्स Documents के अनेक हिस्सों को वेब पेज में दिखाते हैं, जिनमें टेक्स्ट स्ट्रिंग्स, कॉमेंट और एलिमेंट्स शामिल हैं। इसका गलत साइज वेबसाइट की परफॉरमेंस और स्पीड पर असर डालता है। अगर DOM का साइज ज्यादा बड़ा है, तो उसकी वजह से वेबसाइट को लोड होने में समय लग सकता है। इसलिए DOM Size को सुधारकर उसको छोटा और सिंपल रखना चाहिए।

पेज की एक्सपीरियंस और उसकी क्वालिटी को सुधारने के लिए आप Lighthouse नाम के इस टूल का इस्तेमाल कर सकते हैं। लाइटहाउस ने DOM का साइज 1,400 नोड्स तक का होता है। अगर DOM का साइज इससे ज्यादा होता है, तो ये टूल साइज को सुधारने की सलाह भी देता है। 

HTML Rendering में सुधार करें 

वेब ब्राउज़र HTML को पार्स और रेंडर करने के लिए एक निश्चित टाइम और मेमोरी लेता है। ब्राउज़र पर HTML सर्वर से छोटे छोटे टुकड़ों के रूप में आती है। इसके बाद ब्राउज़र इन टुकड़ों को एक-एक करके पार्स करके रेंडर करता है, इससे वेब पेज की परफॉरमेंस में सुधर होता है। 

लेकिन कुछ वेबसाइट HTML को क्लाइंट पर रेंडर करती है इसके लिए जावास्क्रिप्ट का इस्तेमाल किया जाता है इस Process को सिंगल पेज एप्लीकेशन (SPA) कहा जाता है 

इसके नुकसान क्या हैं- 

  • इस Process में जावास्क्रिप्ट से HTML पार्स करने में लगभग दोगुना टाइम और मेमोरी लग जाता है। 
  • इस Process से जब Javascipt से बड़ी मात्रा में HTML को रेंडर किया जाता है, तो वेबसाइट की परफॉरमेंस पर बुरा असर होता है। 

निष्कर्ष – conclusion

आज मैने आपको इस लेख में Core Web Vitals Inp के बारे में बताया है, Google Inp का स्कोर कैसे सुधारें और इस समस्या को कैसे ठीक कर सकते हैं।

आशा करता हूं, कि आपको इस लेख से कुछ सीखने को मिला होगा। अगर इस लेख को लेकर आपका कोई सवाल है, तो आप कॉमेंट करके पूछ सकते हैं। अंत तक पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद, राधे राधे।

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cls fix, how to fix cls
Blogging Tips

CLS Fix 2024:Cumulative Layout Shift को कैसे Fix करें

by Krishnaa December 28, 2023
written by Krishnaa

आज का लेख How to Fix the Cumulative Layout Shift in 2024 पर है। आज मैं आपको बताऊंगा, कि (What is Cls Issue) CLS क्या है, 2024 में Cls Fix Kaise Kare और वेबसाइट की गुणवत्ता, यूजर एक्सपीरियंस, और SEO पर क्या प्रभाव होगा।

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CLS क्या है- (CLS Fix Kaise Kare)

CLS Page Experience सुधारने के लिए एक जरूरी Metric है, इसका पूरा नाम Cumulative Layout Shift है। CLS से आप अपनी वेबसाइट की Visual Stability को देख सकते हैं। 

CLS से पता चलता है, कि जब वेबसाइट का पेज लोड होता है, तब उसके लेआउट और एलिमेंट्स कितनी बार चेंज होते हैं। अगर वेबसाइट के एलिमेंट्स एक से ज्यादा बार शिफ्ट होते हैं, तो इससे वेबसाइट पर आने वाले यूजर को कंटेंट पढ़ने में, बटन और एलिमेंट्स पर क्लिक करने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। CLS Fix Kaise Kare ये जानने से पहले CLS Score के बारे में जानते हैं।

CLS का Score क्या होना चाहिए 

स्कोर समझने के लिए इसको तीन पार्ट में बांट देते हैं और इसे सही से समझते हैं।

  • Good
  • Need Improvement
  • Poor 

1. Good 

वेबसाइट की अच्छी रैंकिंग के लिए Cls Issue का स्कोर 0.1 या उससे कम का होना चाहिए। 

2. Need Improvement (Cls Issue More Than 0.1)

अगर वेबसाइट का CLS स्कोर 0.1 से 0.15 के बीच का होता है, तो आपको CLS Fix करने की जरूरत है।

3. Poor (Cls Issue More Than 0.25)

वेबसाइट के लिए सबसे बुरा CLS Score 0.15 से 0.25 के बीच तक का होता है। अगर वेबसाइट का स्कोर 0.25 से ज्यादा है, तो यह वेबसाइट के लिए सबसे बुरा स्कोर माना जाता है।

CLS के Seo में क्या फायदे हैं

  • CLS को कम करके आप अपनी वेबसाइट को रिस्पॉन्सिव बना सकते हैं।
  • वेबसाइट का CLS Score सही होने से वेबसाइट को गूगल में अच्छा नंबर मिलता है। जिससे यूजर्स भी वेबसाइट के प्रति लॉयल रहता है। 
  • CLS का इस्तेमाल करके वेबसाइट की रैंकिंग को सुधार सकते हैं। 

CLS Fix Kaise Kare- (How To Fix Cumulative Layout Shift)

CLS Fix करने के लिए उसके स्कोर को कम करना होगा, जिसके लिए आप इन तरीकों को फॉलो कर सकते हैं। 

  1. Video Optimize करें
  2. Web और Icon Fonts का इस्तेमाल
  3. Embed and iFrames का इस्तेमाल

1. Video Optimize करें 

विडीयो ऑप्टिमाइज करने से वीडियो फॉर्मेट का साइज, उसकी क्वालिटी और रिज़ॉल्यूशन को पहले से अच्छा और बेहतर बना सकते हैं। इससे फायदा यह होगा, कि वीडियो जल्दी लोड होने लगेगी। जिससे कम डेटा का इस्तेमाल होगा।

और वीडियो और ज्यादा अट्रैक्टिव लगेगी।

Video Optimize कैसे करें

आप वीडियो ऑप्टिमाइज़ करते समय इन तरीकों को फॉलो कर सकते हैं, जो इस प्रकार हैं।

1. वीडियो की फॉर्मेटिंग पर ध्यान दें

वीडियो की फॉर्मेटिंग पर इस प्रकार से ध्यान देना है, जिससे वीडियो ब्लॉग और यूज़र के डिवाइस पर सही से दिखाई दे। ज्यादातर ब्लॉग में Mp4, OGG और WebM ये तीन प्रकार के फार्मेट का इस्तेमाल करते हैं। आप किसी भी एक फॉर्मेट का इस्तेमाल अपनी वीडियो फॉर्मेटिंग के लिए कर सकते हैं।

2. वीडियो की रिज़ॉल्यूशन पर ध्यान दें 

वीडियो की फॉर्मेटिंग साइज और क्वालिटी के अनुसार वीडियो का रिज़ॉल्यूशन को चुनना चाहिए। अगर आप वीडियो में हाई रिज़ॉल्यूशन का इस्तेमाल करते हैं, तो वीडियो को जल्दी लोड होने में समय लग सकता है। जिससे यूज़र का डाटा जल्दी खत्म होगा, इसलिए वीडियो रिज़ॉल्यूशन के लिए आम तौर पर 1080p या 720p का इस्तेमाल किया जाता है। आप किसी एक रिज़ॉल्यूशन का इस्तेमाल अपनी वीडियो में कर सकते हैं।

3. वीडियो डिस्टेंस पर ध्यान दें

वीडियो को टॉपिक के अनुसार छोटा या बड़ा रखना चाहिए, क्युकी इससे यूजर्स को वीडियो का कंटेंट समझने में आसानी रहेगी। इसके लिए आपको ध्यान देना की विडियो को ना ज्यादा छोटा रखना है, और नाही ज्यादा लंबा रखना है। अगर वीडियो ज्यादा समय की हुई तो यूजर्स वीडियो को बीच में देखना छोड़ सकते हैं। इसलिए वीडियो की डिस्टेंस को कम से कम 3 से 10 मिनट तक का इस्तेमाल करना अच्छा मानते हैं।

2. Web और Icon Fonts का इस्तेमाल करें

अक्सर सभी अपनी वेबसाइट पर अलग अलग तरह के फोंट्स का इस्तेमाल करते हैं जिन्हें कस्टम font कहते हैं।

सभी अपनी वेबसाइट के डिजाइन और ब्रांडिंग को अलग और दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए इन फौंट्स का इस्तेमाल करते हैं। 

लेकिन इन फौंट्स का इस्तेमाल करने से वेबसाइट लोडिंग टाइम बढ़ने के साथ वेबसाइट स्पीड पर बुरा प्रभाव पड़ता है। लेआउट शिफ्ट बदलती है और इसमें सुधार नहीं करने से बढ़ोतरी होती है। इससे वेबसाइट का CLS स्कोर खराब हो सकता है। यही नहीं इससे यूजर एक्सपीरियंस पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।  

दोस्तों लेकिन ऐसा होता क्यों है – CLS Fix ना होने के मुख्य दो कारण हो सकते हैं

  • Flashes Of Invisible Text (FOIT)
  • Flashes Of Unstyled Text (FOUT)

1. Flashes Of Invisible Text (FOIT)

जब आप कस्टम Font का इस्तेमाल अपनी वेबसाइट पर करते हैं, तो कस्टम Font के लोड होने तक वेबपेज का टेक्स्ट Hide या Invisible रहता है।

इसीलिए जब कोई यूजर आपकी वेबसाइट को खोलता है, तो वेबसाइट का कस्टम फोंट लोड होने तक यूजर को कोई भी टेक्स्ट या इनफॉरमेशन दिखाई ही नहीं देती है। क्योंकि कस्टम फॉन्ट दिखने के लिए तैयार होने तक वेबपेज खाली दिखाई देता है। 

अगर कस्टम फोंट लोड होने में थोड़ी भी देरी हो जाती है, तो इसका मतलब यह होगा कि आपकी वेबसाइट बहुत ज्यादा धीरे काम कर रही है। इससे आपकी वेबसाइट की लेआउट बदल सकती है। 

यह देखकर यूजर आपकी वेबसाइट को बहुत जल्दी छोड़ कर चला जाता है। जिससे वेबसाइट का बाउंस रेट भी बढ़ता है। बाउंस रेट ज्यादा होने कारण गूगल इसे खराब यूजर एक्सपीरियंस की कैटेगरी में रखता है।

2. Flashes Of Unstyled Text (FOUT) 

जब आप कस्टम Font का इस्तेमाल अपनी वेबसाइट पर करते हैं तो आपको कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है 

यूजर जब वेबसाइट पर आता है तो कस्टम फोंट लोड होने तक Default फोंट में वेबपेज टेक्स्ट यूजर डिवाइस में दिखाई देता हैं। जब आपका कस्टम Font दिखने के लिए तैयार हो जाता है तो Default Font की जगह कस्टम Font दिखने लगता है लेकिन इससे कई बार वेब पेज में लेआउट शिफ्ट की दिक्कत आती है। इसके कारण भी CLS स्कोर बढ़ जाता है।

कस्टम फोंट समस्या को ठीक कैसे करें 

अगर आप अपनी वेबसाइट पर कस्टम फोंट का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको Flashes Of Invisible Text (FOIT) और Flashes Of Unstyled Text (FOUT) दोनों समस्याओं का सामना करना पड़ रहा होगा। इसके कारण आपकी वेबसाइट का CLS स्कोर भी ज्यादा होगा। क्योंकि इनके कारण Layout Shift होती है इन्हें ठीक करने के लिए आपको Font:display Value को अपनी वेबसाइट पर सेट करना होगा।

यह भी पढ़ें:-

  • LCP क्या है और इसे कैसे सुधार सकते हैं, इस लेख को पढ़ सकते हैं।
  • FCP क्या है और इसे कैसे सुधार सकते हैं, इस लेख को पढ़ सकते हैं।

क) Font:Display क्या होता है 

वेबसाइट पर कस्टम Font लोड ना होने के कारण वेबसाइट थोड़ी अलग दिखाई देती है। इस दिक्कत को दूर करने के लिए आप Font:Display का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें आप Auto, Fallback, Swap और Optional फॉन्ट इस्तेमाल कर सकते हैं।

यह CSS का एक हिस्सा होता है, जो वेब ब्राउज़र को सन्देश देता है कि कस्टम Font को तभी दिखाया जाए जब वह लोड होकर तैयार हो जाए। लेकिन अगर कस्टम font तैयार नहीं है या किसी वजह से लोड नहीं हुआ है तब ब्राउज़र वेबसाइट के Default Font या Fallback Font को दिखाता है। 

मुख्य बिंदु –  

  • Fallback Font वेबसाइट का आरक्षित या बैकअप फोंट होता हैं 
  • हमेशा कस्टम Font से मिलते-जुलते Fallback Font का इस्तेमाल करें
  • Font Best Practices को समझने के लिए गूगल रिसोर्सेज पढ़ें 

ख) Font Preload का इस्तेमाल करें

इसका इस्तेमाल करके आप फोंट्स को जल्दी लोड करवा सकते है। इसके लिए आपको <link rel=preload> का इस्तेमाल करना होगा। यह एक ऐसा HTML Tag होता है, जो वेबसाइट के कुछ रिसोर्सेज को जल्दी लोड करने के लिए ब्राउज़र को सन्देश देता है। जैसे – इमेज और फॉन्ट।

Font:Display Optional और Font Preload को WordPress और Blogger दोनों प्लेटफार्म पर इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे वर्डप्रेस पर इस्तेमाल करने के लिए आप Better Resource Hints और Wp Rocket Plugin का इस्तेमाल कर सकते हैं। ब्लॉगर पर इनका इस्तेमाल करने के लिए आपको HTML कोड में बदलाव करना होगा। आप गूगल के रिसोर्सेज से इन कोड को ले सकते हैं, और CLS Fix कर सकते हैं।

3. Embed and iFrames का इस्तेमाल 

CLS स्कोर खराब होने के पीछे इमेज के अलावा Embed, iFrame और Dynamically Injected Content भी होते हैं। 

Embed content क्या होते हैं –  वेबसाइट कंटेंट में हम अक्सर कुछ Embeddable विजेट का इस्तेमाल कंटेंट Embed करने के लिए करते हैं। काफी लोग अक्सर अपनी Websites में यूटूब विडियो या सोशल मीडिया पोस्ट Embed करते हैं। 

iFrame content क्या होते हैं – 

जब हम किसी वेब पेज में किसी दुसरे पेज के कंटेंट को एम्बेड करते हैं तो इसे iframe कंटेंट कहा जाता हैं। एक iframe जो HTML एलिमेंट होता है इसे inline फ्रेम भी कहा जाता है।

Embed content SEO का हिस्सा होते हैं। यह वेबपेज की वैल्यू बढ़ाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि यह लेआउट शिफ्ट का कारण भी बन सकते हैं। इन विजेट के लिए वेबसाइट में जगह आरक्षित रखनी चाहिए। ताकि ब्राउज़र को वेब पेज कंटेंट को अच्छे से व्यवस्थित करने में परेशानी न हो। इससे CLS स्कोर भी अच्छा हो सकता है।

4. Dynamically Injected Content

Viewport – यह वेबसाइट का वह हिस्सा होता है जो यूजर डिवाइस पर दिखाई देता है। 

देरी से लोड होने वाले कंटेंट( Late load content) को कभी भी viewport के सबसे ऊपरी और निचले हिस्से में मत रखें। इससे बड़ा लेआउट शिफ्ट देखने को मिल सकता है। क्योंकि यह कंटेंट अपने आस पास के कंटेंट को इधर-उधर खिसका सकता हैं। ऐसा करने से कभी-कभी कंटेंट स्क्रीन से ही हट जाता है। 

इस कंटेंट से होने वाले लेआउट शिफ्ट को रोकने के लिए आप fix साइज़ के कंटेनर का इस्तेमाल कर सकते हैं 

इसके अलावा आप Carousel का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। वर्डप्रेस में इसे आसानी से किया जा सकता हैं। जब आप कोई पोस्ट लिखते हैं तो प्लस बटन पर जाकर आप Carousel को ले सकते हैं। इसके अलावा आप किसी पैराग्राफ को सेलेक्ट करके टूल्स से इसे आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं। 

Dynamically Injected Content से होने वाले लेआउट शिफ्ट से बचने के लिए हमेशा इन कंटेंट के लिए जगह अरक्षित (Reserve) रखें, ताकि ब्राउज़र आसानी से वेब पेज कंटेंट को अच्छे से व्यवस्थित कर सके। आप अरक्षित जगह रखने के लिए CSS में Min-height को अपडेट कर सकते हैं। इससे CLS काफी हद्द तक कम की जा सकती है। 

निष्कर्ष- CLS Fix 2024

आज का लेख CLS Fix Kaise Kare पर है। मैं आशा करता हूं, कि आपको इस लेख से कुछ सीखने को मिला होगा। मैं यह भी आशा करता हूं, कि इस लेख में मिली जानकारी आपको CLS Issue को ठीक करने में सहायता करेगी। 

CLS, Google Search Console के Core Web Vitals के तीन जरूरी पॉइंट्स LCP, FCP और CLS हैं। जिन्हे मैने अपने इन सभी लेख में समझाने कि पूरी कोशिश की है। अगर अपने ये लेख नहीं पढ़ें हैं, तो इन्हे पढ़ सकते हैं। क्योंकि यह आपकी Google Core Web Vitals के Issue को सुधारने में मदद करेंगे।

आप कॉमेंट करके अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें, की आपको Techaasvik Blog पर दी जाने वाली जानकारी कैसी लगती है। लेख को पढ़ तक पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद, राधे राधे।

December 28, 2023 0 comments
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